Google+ Followers

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

महिलाए ही नसबंदी क्यो कराये ,पुरूष क्यों नहीं

     टीक टीक चलती जनसंख्या की घडी हमें रोज इस बात के लिए आगाह करती है कि बेतहाषा बढती जनसंख्या विस्फोटक की गति को रोक लगाने के लिए राष्ट्ीय परिवार कल्याण कार्यक्रम द्धारा जगह-जगह नियमित नसबंदी f’kविर लगाये जाते है।पुरूष और महिला नसबंदी ही एक मात्र परिवार नियोजन का स्थाई समाधान है।
      जहां एक और महिलाओं के षरीर की रचना जटिल होती है।अधिकाष महिलाए जनन मू़त्र संस्थान के संक्रमण, ल्युकोरिया, एनिमिया और आॅस्टियोपोरोसिस से ग्रसित होती है।ऐसी स्थिति में उनको उनका बच्चा जनने का दायित्व बताकर नसबंदी कराइ्र्र जाती है।पुरूष प्रधान समाज में महिलाए आम तौर पर चुुपचाप यह स्वीकार कर आॅपरेषन करा लेती है क्योंकि नसबंदी न कराने पर गर्भवती होने का व प्रसव पीडा पुनः भोगने का डर उसे हमेषा बना रहता है।महिला न कराती है तो उसे गृह कलह का भी सामना करना पडता है। ऐसी विडम्बना में नारी के पास एक ही उपाय है कि वह सर्मपण कर दे और अपनी नसबंदी करा दे।
      जबकि इसके विपरित पुरूष अपनी नसबंदी नही करवाकर अपनी स्वेच्छा से सभी आनन्द लेना चाहता,उसको यह मिथ्या गुमान रहता है कि बच्चे पैदा करने का काम महिलाओं का ही है जब की वह पूर्ण रूप से बीजारोपण का जिम्मेदार  वह स्वयं है, अतः दोनो की समान भागीदारी आन पडती है ऐसे में इस तरह के कुठित विचारो से समाज मे इस कार्यक्रम के प्रति अलग ही नजरिया बन गया है ।कई पुरूष यह सोचते है कि नसबंदी कराने से उनकी मर्दानगी चली जायेगी और यौन क्षमता क्षीण हो जायेगी, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से पुरूष नसबंदी कुछ ही मिनटो का आउटडोर प्रोसिजर है।आजकल बीना टीका लगाये पुरूष नसबंदी होने का प्रचलन बन गया है। जो कोई भी पुरूष चलते फिरते कभी भी करा सकता है। इसे चिकित्सक लंच ब्रेक आपरेषन भी कहते है।
 परिवार की खुषहाली  के लिए पति-पत्नि दोनों का समान अधिकार है तथा वे दोनो ही संयुक्त रूप से जिम्मेदार है।पुरूष नसबंदी बहुत ही सरल,सुलभ और व्यवहारिक आॅपरेषन है,ऐसे में महिलाओं को आगे नसबंदी कराने धकेल देना कहा तक न्याय संगत है।
 प्रषेकः-
श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
  महादेव कालोनी
 बाॅसवाडा राज
      हमारे देष में छोटे परिवार की अवधारणा पर जोर लगाना होगा।  ग्रामीण और अनपढ महिलाये नौ महिनों की गर्भावस्था और प्रसव वेदना के बाद षिषु पालन का बोझ जिन्दगी भर उठाती रहती है।अधिकाष करीबन 99प्रतिषत मामलों में महिलाऐ ही नसबंदी ट्यूवेक्टामीद्ध कराती है
पुरूष  नसबंदी वेसेक्टोमीद्ध करीब करीब कम ही देखी जाती है।       अस्पताल में डिलेवरी के बाद चिकित्सक मरिज की रजाबंददी से नसबंदी करते है,जो एक अच्छी बात है, जबकि पुरूष कभी भी नसबंदी के लिए राजी नही होते है,वे महिलाओं को आगे धकेल देते है कि बच्चा पैदा करना पत्नि का काम है अतः बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्ी पर नसबंदी रूपी ताला लगा दिया जाना ही परिवार नियोजन है और यह काम पत्नि का है।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

महिलाए ही नसबंदी क्यो कराये ,पुरूष क्यों नहीं

            टीक टीक चलती जनसंख्या की घडी हमें रोज इस बात के लिए आगाह करती है कि बेतहाशा  बढती जनसंख्या विस्फोटक की गति को रोक लगाने के लिए राष्ट्ीय परिवार कल्याण कार्यक्रम द्धारा जगह-जगह नियमित नसबंदी f’kfoj  लगाये जाते है।पुरूष और महिला नसबंदी ही एक मात्र परिवार नियोजन का स्थाई समाधान है।

      हमारे देश में छोटे परिवार की अवधारणा पर जोर लगाना होगा।  ग्रामीण और अनपढ महिलाये नौ महिनों की गर्भावस्था और प्रसव वेदना के बाद f’k’kq  पालन का बोझ जिन्दगी भर उठाती है।अधिका’k   करीबन 99प्रतिषत मामलों में महिलाऐ ही नसबंदी ;ट्यूवेक्टामी  कराती है,पुरूष  नसबंदी ;वेसेक्टोमी करीब करीब कम ही देखी जाती है।

       अस्पताल में डिलेवरी के बाद चिकित्सक मरिज की रजाबंददी से नसबंदी करते है,जो एक अच्छी बात है, जबकि पुरूष कभी भी नसबंदी के लिए राजी नही होते है,वे महिलाओं को आगे धकेल देते है कि बच्चा पैदा करना पत्नि का काम है अतः बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्ी पर नसबंदी रूपी ताला लगा दिया जाना ही परिवार नियोजन है और यह काम पत्नि का है।

      जहां एक और महिलाओं के ’kरीर की रचना जटिल होी है।अधिका’k महिलाए जनन मू़त्र संस्थान के संक्रमण, ल्युकोरिया, एनिमिया और आॅस्टियोपोरोसिस से ग्रसित होती है।ऐसी स्थिति में उनको उनका बच्चा जनने का दायित्व बताकर नसबंदी कराइ्र्र जाती है।पुरूष प्रधान समाज में महिलाए आम तौर पर चुुपचाप यह स्वीकार कर आॅपरे’kन करा लेती है क्योंकि नसबंदी न कराने पर गर्भवती होने का व प्रसव पीडा पुनः भोगने का डर उसे हमे’k  बना रहता है।महिला न कराती है तो उसे गृह कलह का भी सामना करना पडता है। ऐसी विडम्बना में नारी के पास एक ही उपाय है कि वह सर्मपण कर दे और अपनी नसबंदी करा दे।

      जबकि इसके विपरित पुरूष अपनी नसबंदी नही करवाकर अपनी स्वेच्छा से सभी आनन्द लेना चाहता,उसको यह मिथ्या गुमान रहता है कि बच्चे पैदा करने का काम महिलाओं का ही है जब की वह पूर्ण रूप से बीजारोपण का जिम्मेदार  वह स्वयं है, अतः दोनो की समान भागीदारी आन पडती है ऐसे में इस तरह के कुठित विचारो से समाज मे इस कार्यक्रम के प्रति अलग ही नजरिया बन गया है ।कई पुरूष यह सोचते है कि नसबंदी कराने से उनकी मर्दानगी चली जायेगी और यौन क्षमता क्षीण हो जायेगी, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से पुरूष नसबंदी कुछ ही मिनटो का आउटडोर प्रोसिजर है।आजकल बीना टीका लगाये पुरूष नसबंदी होने का प्रचलन बन गया है। जो कोई भी पुरूष चलते फिरते कभी भी करा सकता है। इसे चिकित्सक लंच ब्रेक आपरे’kन भी कहते है।

परिवार की खु’kहाली  के लिए पति-पत्नि दोनों का समान अधिकार है तथा वे दोनो ही संयुक्त रूप से जिम्मेदार है।पुरूष नसबंदी बहुत ही सरल,सुलभ और व्यवहारिक आॅपरेषन है,ऐसे में महिलाओं को आगे नसबंदी कराने धकेल देना कहा तक न्याय संगत है।

  प्रषेकः-
  श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
 महादेव     काॅलोनी
                                            बाॅसवाडा राज

रविवार, 27 नवंबर 2011

नई दुल्हन -मैं, माॅव मायके से बचे


                                                             

                       विवाह के बाद इस गाने के साथ ’बाबुल की दुआॅए लेती जा:ःःःःःःःमायके की कभी याद न आये,दुल्हन की विदाई होती है।दुल्हन भी दिल में कई सपने संजोये व हसरत लिए सुसराल में कदम रखती है,लेकिन सुसराल में अपने पिया की प्रिया बनने के साथ सास-ससुर की दुलारी बहु, देवर व नंनद की प्यारी मां स्वरूपा भाभी भी बनना हैै।नई दुल्हन सुसराल वालो के लिए आकर्षण का केन्द्र बिन्दु होती है,समस्त परिवार की निगाहें उसके चाल,व्यवहार ,हॅसने व उठने -बैठने  पर होती है, ऐसे समय में नई दुल्हन को कुछ बातों को भुलना होगा कुछ को अपनाना होगा।
 सर्वप्रथम नई दुल्हन को अपने अहम् को त्यागकर ‘मै’ के स्थान पर हम को अपनाना होगा।

  माॅ का स्थान सुसराल में सासुमां को देना होगा।

 मीठी वाणी से सबके दिलो पर राज करना होगा।
 बात-बात मेें मायके के गुणगान न करके सुसराल को प्राथमिकता देनी चाहिये।
 नई दुल्हन को सुसराल के तौर-तरिको पर टीका-टिप्पणी न करके धीरे-धीरे इसे समझने ,अपनाने व जानने की कोशिश करनी चाहिए, नापंसद होने पर समय व माहौल के साथ बदलने की कोशिश करनी चाहिए।
 नई दुल्हन को अपनी चाल व आवाज को संयमित रखकर चलना और बोलना, न की हाथों को हिलाते हुए तेज-तेज स्वर में बोलना चाहिए।
 मर्यादित व शिष्टतापूर्ण व्यवहार से सुसराल वालो को अपना बनाना चाहिए।
 नई दुल्हन सुसराल में सिर पर पल्लू  लेना न भूले, इसे अपनी पहचान और सुसराल की शान समझे ।
 नई दुल्हन सुसराल में प्यार के बदले प्यार बाॅटे ,न की सुसराल वालो के प्यार का अनुचित फायदा उठाकर,गलत व्यवहार करे।
 पति की बाॅस बनने की कोशिश न करे, बल्कि अपने प्यार व व्यवहार से धीरे-धीरे उनका विश्वास व दिल जीते ।

 सुसराल में नौकरो के साथ भी नम्रता पूर्ण व्यवहार रखे।
 नई दुल्हन को सुसराल में छोटे-बडे रिश्तो की अहमियत को समझते हुए,उनके अनुसार आदर ,प्यार दुलार और सम्मान देना चाहिए।


 
 सुसराल वालोे से लेना ही नहीं ,देना भी सीखे ।

 सुसराल में खुशनुमा माहौल के लिए त्याग करना पडे तो करे और हमेशा सहयोग के लिए तैयार रहे

 नई दुल्हन हमेशा इस बात को समझे कि आपका पति पहले किसी का बेटा   और भाई है,इस पर हक जताकर माॅ व बहन के प्यार को ठेस न पहुचाए।
 सास-सुसर को दिल से माता-पिता समझे और माता-पिता की तरह सम्मान  और प्यार दें।
इन बातों का ध्यान रखकर नई दुल्हन सुसराल में अपना स्थान बनाकर सबकी दुलारी बहु ,भाभी व प्रिया का खिताब जीत सकती है।
            


              प्रेषकः-
              श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
              अस्पताल चैराहा
              महादेव कॅंालोनी
     बाॅसवाडा राज           

रविवार, 6 नवंबर 2011

माता-पिता को मुखाग्नि एक बेटी क्यों नही दे सकती?

                                 आज मेरे दिमाग में एक प्रष्न बार-बार उमड रहा है कि माता- पिता को मुखाग्नि एक बेटी क्यों नही दे सकती है?कहा भी जाता है कि माता पिता के लिए पुत्र व पुत्री समान है और कानूनी रूप से भी सम्पति में भी समान रूप से हकदार है। आज बेटीया उॅच षिक्षा प्राप्त कर पुरूष्ोैे के बराबर उॅची नौकरीया कर रही है।आज वे भी घर की चारदीवारी लाॅघकर खुली हवा में साॅस ले रही है। फिर क्यों इसे इस अधिकार से वंचित किया जाता है यह एक विचारणीय प्रष्न है।


                     हमारे   ष्षास्त्रों व रीति व रिवाजो के अनुसार माॅ-बाप का दाह-संस्कार उनके पुत्र के हाथों होता है व बेटे के न होने पर समाज के या परिवार के अन्य  पुरू ष्ो द्धारा माता-पिता की चिता को मुखाग्नि दी जाती है ।जब बेटीया विरोध करती है और माता -पिता को मुखाग्नि देने की बात करती है,तो रूढियों में जकडा भारतीय समाज षास्त्रों  व मोक्ष न होने की दुहाई देकर इसे नकार देता है। यह एक विचारणीय पहलू है कि माॅ-बाप का अपना खून होते हुए भी एक बेटी घर के एक कोने में बैठी षोक मनाते हुए, किसी दूसरे को माता-पिता के दाह संस्कार का हक कैसे दे सकती है। चुकि आज हमारी सामाजिक मान्यताओं व रूढियों में बहुत बदलाव आया है,एक और जहाॅ बेटियो ने चारो दिषाओं मे अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है, ऐसे में बेटिया को उनके अधिकार से वंचित करके समानता की दुहाइ्र देने वाला यह समाज हमारी बेटियोे के साथ यह कैसा न्याय कर रहा है।


                           जीते जी माता-पिता की अपेक्षा करने वाले बेटे उनके मरने पर  उनकी अंतेष्टि पर  लाखों रूपये खर्च करके  तथा संवेदनहीन समाज को भोज देकर यह  दिखाने में सफल हो जाते है कि उनका अपने माता-पिता से बहुत लगाव था।बेटिया जो निःस्वार्थ भाव से माता-पिता की सेवा करती है,लेकिन उसे मुखाग्नि देने का अधिकार नहीं होता है।कहा जाता हैकि माता पिता की मृत देह को बेटा दाह-संस्कार नही करेगा या बेटा कंधा नहीं देगा तो उनकी आत्मा को षांति नही मिलेगी या मोक्ष की प्राप्ति नही होगी। लेकिन यह सोच बदलनी होगी ।बेटी तो माता-पिता की आत्मा है,और आत्मा तो कभी नही मरती है ,बेटियों को यह अधिकार मिलना ही चाहिये।

                                  श्रीमति भुवनेष्वरी मालोत
                                 अस्पताल चैराहा
                                   महादेव काॅलोनी
                                    बाॅसवाडा राज             

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

WEERA: मिठाई खरीदने और उपयोग करने संबधी टिप्स या सोचिए-...

WEERA: मिठाई खरीदने और उपयोग करने संबधी टिप्स या सोचिए-...: दीपावली रोशनी, उल्लास व खुशियों का त्यौहार है। बि...

WEERA: मिठाई खरीदने और उपयोग करने संबधी टिप्स या सोचिए-...

WEERA: मिठाई खरीदने और उपयोग करने संबधी टिप्स या सोचिए-...: दीपावली रोशनी, उल्लास व खुशियों का त्यौहार है। बि...

मिठाई खरीदने और उपयोग करने संबधी टिप्स या सोचिए- मिठाई खरीदने से पहले

                                                                         


             दीपावली रोशनी, उल्लास व खुशियों का त्यौहार है। बिना मिठाईयों, स्वादिष्ट व मनभावन पकवानों के दीपावली अधूरी है, कई गृहणीयां दीपावली पर घर में मिठाईयां बना लेती है,फिर भी अधिकाश घरों में समय के अभाव व विभिन्नता के चक्कर में व उपहार में देने के लिए मिठाईयां बाजार से खरीदनी ही पडती है।बाजार से मिठाई खरीदने से पहले कुछ सावधानियाॅ बरती जाए,तो स्वास्थ्य व पैसो के नुकसान से बचा जा सकता है।
          इस त्योहार पर हलवाई कई दिनों पहले मिठाईयाॅ बनाना शुरू कर देते है, अधिकांश मिठाईयां दूध से बने मावे,छैने तथा पनीर से बनाई जाती है, जिसे हलवाई कई दिनो पहले तैयार करके रखते है, इससे बनी मिठाईयां स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती है, कई बार इसका सेवन करने से जी मिचलाना, पेट मेे दर्द,दस्त-उल्टी आदि बीमारियाॅ त्योहार के मजे को किरकिरा कर देती है, अतः मिठाईयां खरीदने व उपयोग करने से पहले निम्न बातो पर गौर करना जरूरी है।


ऽ दूध से बनी मिठाईयां आवश्कतानुसार ही लाये, क्योंकि ये दो दिन में खराब हो जाती है।





ऽ ध्यान रहे मिठाई  के वजन के साथ गते के डिब्बे का वजन  शामिल न हो।

ऽ चॅादी के वरक से सजी मिठाई का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं ,क्योंकि चांदी के स्थान पर शीशे आदि की मिलावट आम बात है।


ऽ बंगाली मिठाईयों जैसे चमचम, रसगुल्ला,राजभोग आदि पुरानी होने पर अपना स्वाभाविक स्वाद खो देती है,इसलिए ऐसे अवसर पर न खरीदे।

ऽ मिठाई को खरीदने के बाद गते के डिब्बे से निकालकर अन्य पात्र में रखे ,ताकि ज्यादा दिन तक सुरक्षित रह सके ।

ऽ उपहार में मिठाई देते समय दूध से बनी मिठाई न खरीदे। जरूरी हो तो खरीदते समय विशेष सावधानी बरते

ऽ टेस्ट करके ही हलवाई से मिठाई खरीदे और लम्बे समय के लिए उपयोग करनी हो तो, उसे फ्रीज में रख दे।

ऽ रंगीन मिठाईयों के रंग स्वास्थ्य के लिऐ हानिकारक है, जहां तक संभव हो बिना रंग की मिठाईयां ही खरीदे ।

ऽ जहा तक संभव हो अपने हाथों से बनी मिठाईयों व  पकवान से इस त्योहार को मनाईये। 

  थोडी सी सावधानी के साथ इस त्योहार का मजा लिया जा सकता है।






लेखकः-
 श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
  अस्पतालचैराहा,                                        
महादेव का.लोनी,    
बांसवाडा राज.
  

मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

बच्चों को अच्छे संस्कारों की वसीयत दें






                 कल मै अपनी सहेली से मिलने उसके घर गई, हम लम्बे समय के बाद मिले थे, आपस में गपषप में मषगूल हो गए, पास में ही उसके बेटे के दो प्यारे-प्यारे बच्चे खेल रहे थे कि अचानक दोनों में किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया इतने में मेरी सहेली की बहू आयी और बिना कारण जाने दोनों बच्चों को एक-एक चांटा मारा और डाँटकर अपने कमरे में जाकर पढ़ने को कहा दोनों बच्चे रूआसे होकर चले गए लेकिन मेरे समक्ष एक प्रषन छोड़ गये क्या मारने-पिटने से बच्चे सुधर जायेंगे। नहीं, यह हम सभी जानते हैं कि मारने से बच्चे सुधरते नहीं और ज्यादा बिगड़ जाते हैं। बच्चा षब्द दिमाग में आते ही एक भोला भाला जिद करता हुआ मासूम-सा चेहरा आंखों के सामने घूम जाता हैं, बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, जिस संस्कार रूपी ढाँचे में डालेंगे वैसे ही बन कर निकलेंगे। बच्चों का भविष्य परिवार के वातावरण व माता-पिता के संस्कारों पर निर्भर करता हैं, वे काँच की तरह होते हैं, उन्हे तोड़ने के बाद जोड़ना बड़ा मुष्किल होता हैं। अगर माँ-बाप उनके साथ कठोर व्यवहार करते हैं तो वे भय के कारण झूठ बोलने लगेंगे। अपनी समस्या को माँ-बाप के साथ ष्षेयर नहीं कर पायेंगे जिससे वे अन्दर ही अन्दर घुटने लगेंगे। बाल्यावस्था बहुत ही नाजुक होती हैं इसमें कई ष्षारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं। ऐसे समय में बच्चों को कठोरता के साथ वात्सल्य व प्यार की भी जरूरत होती हैं। इसलिए बच्चों के साथ संतुलित व्यवहार करना जरूरी हैं।




                     आज बच्चों का बचपन तो विज्ञापनों के रंग-बिरंगे मोहजाल में जकड़ चुका हैं। वह टी.वी व पिक्चरों के पात्रों की तरह व्यवहार करते हैं जो हिंसक व अष्लील होते हैं इसका प्रभाव उनके मस्तिष्क पर उतना पड़ता हैं कि वे समय से पहले व्यस्क हो जाते हैं और सब कुछ जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। इस उम्र में बच्चे रेत की तरह होते हैं जितना कसकर पकड़ने की कोषिष करंेगे उतना हाथ से फिसल जायेंगे।


                    आज हम बच्चों केा क्या सीखा रहे हैं, आप स्वंय जानते है, बच्चों को कहते हैं बेटा मार खा कर मत आना, जो तेरे साथ जैसा व्यवहार करता हैं उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना। आज हम जब कोई घर में या स्कूल में बच्चे की भलाई के लिए डाँटते हैं या मारते हैं तो हम बच्चे का पक्ष लेते हैं और उनसे कहते हैं बच्चे को हाथ लगाने की जरूरत नहीं हैं, साथ ही आधुनिकता का सहारा लेकर माता-पिता बच्चों को आवष्यकता से अधिक लाड-प्यार दिखाकर जिद पूरी करके उनकी गलत आदतों को प्रोत्साहन देते हैं उनकी भूलों पर परदा डालने का कार्य करके उनके षुभ चितंक बनने के बजाय उनके षत्रु बन जाते हैं यहीं बच्चे जब बड़े होकर माता-पिता को पलटवार जवाब देते हैं। कहना नहीं मानते, गलत कार्य करते हैं, तब माता-पिता को होष आता हैं लेकिन अब पछताने में क्या फायदा बहुत देर हो चुकी होती हैं।

                   जैसे महावत हाथी के पैर में रस्सी ड़ालता हैं एवम् उसके छोटे बच्चे के पैर में भी जंजीर डालता हैं ताकि उसकी आदत में आ जाए। माता-पिता को भी बच्चों की वृद्धि को ध्यान रखते हुए व्यवहार करना चाहिए। बच्चों को चिंतित व व्यथित चिल्लाने वाली माँ नहीं चाहिये, उन्हे मनस्वी व प्रभावी माँ चाहिये जो उसके साथ संवाद बनाये रखे। कहा जाता है कि जो माँ दक्षता के साथ बच्चों के पेट में घुसना जानती हैं उसके बच्चे कभी गलत राह पर नहीं जा सकते हैं। माता-पिता को हमेषा अपना तीसरा नैत्र जागृत रखना चाहिए।

                        कहा गया हैं कि पूत कपूत तो क्यो धन संचय, पूत सपूत तो क्यो धन संचय। इसलिए आपका असली धन तो बच्चे हैं इसलिए बच्चों को अपने व्यस्त जीवन का कुछ समय अवष्य दे ताकि उन्हे अच्छे संस्कारों की वसीयत मिल सकें।
 


              यह सच हैं कि आज समय व परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं पाष्चात्य संस्कृति के कारण माँ-बाप की भूमिका में भी बदलाव आया हैं। आधुनिक बच्चे माँ नहीं सुपर माॅम चाहते हैं इसलिए समय के साथ आपको भी बदलना होगा, सुपर माॅम बनकर सुपर गुणों का वारिस बच्चों को बनाना होगा ताकि वह आपकी बगिया का सुन्दर फूल बन सके।
           
           प्रेषक -
          श्रीमति भुवनेष्वरी मालोत
           महादेव कालोनी
           बाँसवाड़ा (राज.)
           मो. 9414101780

सोमवार, 26 सितंबर 2011

WEERA: पहले श्रृद्धा, फिर श्राद्ध करे

WEERA: पहले श्रृद्धा, फिर श्राद्ध करे: हमारी संस्कृति कई रीति रिवाजों और परम्पराओं का समन्वय लिए हुए है। हिन्दुओं में श्राद्ध प्रथा बहुत प्राचीन है,जो आज भी अति शुभ मानी जाती है। ...

पहले श्रृद्धा, फिर श्राद्ध करे

हमारी संस्कृति कई रीति रिवाजों और परम्पराओं का समन्वय लिए हुए है। हिन्दुओं में श्राद्ध प्रथा बहुत प्राचीन है,जो आज भी अति शुभ मानी जाती है। हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार मृतात्मों को उचित गति मिले, इसके हेतु मरणोउपरांत पिडदान, श्राद्ध और तर्पण की व्यवस्था की गई है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धापूर्ण व्यवहार तथा तर्पण का अर्थ है तृप्त करना, श्राद्ध-तर्पण का अर्थ है पितरो को तृप्त करने की प्रक्रिया है। आश्विन मास में श्राद्ध पक्ष में पितरों का तर्पण किया जाता है और पितरों की मृत्यु के नियत तिथि पर यथाशक्ति बम्ह भोज और दान दिया जाता है। शास्त्रो में व गुरू पुराण में कहा गया है कि संसार में श्राद्ध से बढकर और कल्याणप्रद ओर कोई मार्ग नहीं है,अतः बुद्धिमान व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। पितृ-पूजन से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग , कीर्ति , पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते है। 

      मुगल बादशाह शाहजंहा ने भी हमारी संस्कृति  के श्राद्ध पक्ष की सराहना की है,जब उनके क्रूर्र पुत्र सम्राट  औरंगजेब ने उन्हें जेल में बंद कर यातना दे रहा था और  पानी के लिए तरसा रहा था । आकिल खाॅ के ग्रंथ वाके आत आलमगीरी के अनुसार शाहजहा ने अपने पुत्र के नाम पत्र में मंर्मात वाक्य लिखे थे ‘है पुत्र तू भी विचित्र  मुसलमान है, जो अपने जीवित पिता को जल के लिए  तरसा रहा है,शत्-शत् बार प्रशंसनीय है,वे हिन्दु जो अपने मृत पिता को भी जल देते है।’

         अगर हमारे मन में जीवित माता-पिता बुर्जगों के प्रति श्रद्धा नहीं है तो उनके मरने के बाद उनका श्राद्ध मनाने का औचित्य क्या है,हम श्राद्ध इस डर से मनाते है कि हमारे पितरों की आत्मा कही भटक रही होगी तो हमें कही नुकसान नही पहुचाए,उनका अन्र्तमन उनको धिक्कारता हैकि हमने अपने मृतक के जीते जी उन्हें बहुत तकलीफ पहुचाई है,इसलिए मरने के बाद ये  पितृ हमें भी तकलीफ पहुॅचा सकते है।इसलिए हम श्राद्ध    पक्ष मनाकर अपने पितरों को खुश करने का प्रयास करते   है। 

         जिस काग की सालभर पूछ नहीं होती है  उन्हें श्राद्ध पक्ष में कागो-वा-2 करके छत की मुडेर पर  बुलाया जाता है और पितरो के नाम से पकवान खिलाये  जाते है और पानी पिलाया जाता है,खा लेने पर यह सोचकर सन्तुष्ट हो जाते है कि हमारे पिृत हमसे प्रसन्न   है।

       आज की युवा-पीढी में श्राद्ध मनाने के प्रति श्रद्धा  भाव खत्म हो चुका है,वह समाज की नजर में प्रंशसा  पाने और दिखावे के लिए लम्बे-चैडे भोज का आयोजन  करती है।हमे हमारे बुर्जगों को जीते जी प्यार ,सम्मान व  श्रद्धा देनी होगी।      

      श्राद्ध पक्ष हमें अपने पूर्वजों के प्रति   अगाध श्रद्धा और स्मरण भाव के लिए प्रोत्साहित करता है, हमें इसे सादगीपूर्वक मनाकर भावी पीढी को भी  अनुसरण करने की प्ररेणा मिलेगी।                                                                    
                         प्रेषकः-
 श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
 अस्पताल चैराहा
  महादेव कॅालोनी
 बांसवाडा राज

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

बेटिया निराली होती है

मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में बेटी को माता.पिता की आत्मा और बेटे को हृदय की संज्ञा दी हेै। हृदय की धडकन तो कभी भी बंद हो सकती है लेकिन बेटी व आत्मा का संबध जन्मजंमातर का रहता है वह कभी अलग नहीं हो सकती है।

वाकई हमारी बेटिया निराली है उसे आप बढने मे इतनी मदद करे की वह कली से फूल बनकर फिजा मे अपनी खूशबू बिखेरा करे इन बेटियों की उपलब्धिया असीम है ।जीवन को अमृत तुल्य बनाने वाली इन बेटियो को इतना प्यार .दुलार दो कि हर लडकी की जुबान पर यही बात हो अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

कुसंस्कारो का प्रभाव



                            एक फोटोग्राफर के मन मं विचार आया कि अपने

स्टूडियो मे एक सुन्दर व सुसंस्कृत बालक का फोटो लगाये। इसके

लिए जगह-जगह घूमने के बाद उसको एक गांव में दस वर्षीय बालक

 सर्वाधिक सुन्दर लगा।उसने उसके माता -पिता की अनुमति से

उसका फाटो लिया और स्टूडियो में लगा दिया

                                        20 साल बाद उसके मन मे सबसे कुरूप

व्यक्ति का फोटो भी स्टूडियो में लगाने का विचार आया।इसके लिये

जेलों में जाकर अपराधियो से मिला जो लम्बा कारावास भुगत रहे थे

 । वहा उसे ऐसा व्यक्ति मिला जिसके चारो और मक्खिया भिनभिना

रही थी और शरीर से बदबू आ रही थी,दिखने में अत्यतं बुढा व

कुरूप लग रहा था।उसने सोचा इससे ज्यादा कुरूप व्यक्ति और कोई

नही हो सकता ।वह फोटो लेने लगा तो,वह व्यक्ति रो पडा।

                    रोने का कारण पूछा तो वह बोला जब मैं दस वर्ष का 

बालक था,तब भी एक फोटोग्राफर ने फोटो लिया था क्योंकि में उस

समय उसको सबसे सून्दर व सुसंस्कृत लगा था।किन्तु बाद में

कुसंस्कारों व कुसंगति के प्रभाव से गलत रास्ता पगड लिया और मेरे

 में कई दुर्गण आगये।जिससे झगडा,चोरी आदि करने लगा और

समाज मे भी घृणा की दृष्टि से दंेखा जाने लगा और आज में यहां

इस स्थिति मे पहुच गया।यह मेरे कुसंगति व कुसंस्कारो का ही

 परिणाम है। फोटोग्राफर बिना फोटो लिये ही वापस चला गया।

इससे पता चलता है कि वातावरण व संगति से व्यक्ति के संस्कार


प्रभावित हुए बिना नही रह सकते।संसंस्कारित बालक ही बडा होकर

 सफल होता है।पारिवारिक जीवन मे स्नेहपूर्ण वातावरण वनाता है,राष्ट्

 के विकास मे सहायक होता है अतः बच्चो को सुसंस्काति करने का

 प्रयत्न करना चाहिये ।







श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत

बुधवार, 24 अगस्त 2011

मधुमेह रोगी के लिए-अंकुरित मैथी व गेंहू के खाखरे

           
 
  

 
vadqfjr eSFkh





   सामग्रीः-

एक कटोरी  अंकुरित गेंहू का आटा] आधी

कटोरी अंकुरित मैथी का आटा]मोयन के लिए तेल

 एकचम्मच]अजवाइन]नमक स्वादानुसार

आधचम्मच हल्दी] आधा चम्मच मिर्चं A



   विधि 

      गेंहू व मैथी को अलग अलग 7से 8 घंटे

 भिगोकर उसे कपडे में बाध कर 12से 14 घंटे के

 लिए अंकुरित होने के लिए रख दे ।अंकुरित होने


पर धूप में सूखा दे ।फिर उसका आटा तैयार

 करके दोनो आटे मिलाकर उसमें अजमाइन तेल 

]नमक हल्दी मिर्च सारी सामग्री मिलाकर।आटा

 गॅुथ ले फिर उस आटे से पतले -पतले खाखरे
बनाकर तवे पर सेक ले।


इसे एयर टाईट डिब्बे में रखे ।8से 10दिन
 तक इसको काम मे ले सकते ।

यह मधुमेह के रोगी के लिए कई

पSf"Vक तत्वो से भरपूर है।इस

मधुममेही खाखरे मे ग्लायेसेमिक

 इण्डेक्स कम है अतः 'kqगर की मात्रा बराबर बनी

 रहती है।

  श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत






रविवार, 21 अगस्त 2011

आधुनिक और पुरातन में समन्वय - नारी कैसे करे


                                                                

        
भारतीय संस्कृति की सर्वोपरि विषेषता समन्वय रखना है। भारतीय नारी संस्कृति के इसी गुण को अपना कर आधुनिक व पुरातन संस्कृति के बीच समन्वय बीठा सकती है। समन्वय आधुनिक व पुरातन संस्कृति के बीच आवश्यक है, संस्कृति चेतन है, जड़ नही। भारतीय संस्कृति में नारी को दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती के रूप में दर्शाया गया है। गणेश जी के लिए कहा जाता है कि वे सरस्वती के लिपिक रहे है। इसी से यह प्रदशित होता है कि नारी का प्रभाव किसी भी प्रकार से पुरूष से कम नहीं है।



                    सदियों से नारी के कार्य क्षेत्र को परिवार तक सीमित रखकर उसे परिवार की इच्छाओं व आंकाक्षाओं के लिए हर पल त्याग की उम्मीद की जाती है। घर की धूरी मानी जाने वाली नारी को हर क्षेत्र में अपने आप को आधुनिक कहलाने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।  आधुनिक शिक्षा ने नारी को महत्वकांक्षी बना दिया है। प्रतिर्स्पद्वा की दौड़ में वह अपने परिवार व बच्चों को भूल कर पुरूषों से आगे निकल जाना चाहती है, लेकिन अपनी संस्कृति को कायम रखने की उम्मीद नारी से ही की जाती है। आज की नारी कुछ बातों को ध्यान में रखकर दोनों में सांमजस्य स्थापित कर सकती है।



 सर्वप्रथम नारी को शिक्षित हो कर आत्म निर्भर होना होगा। महात्मा गांधी का कथन है कि ‘‘एक शिक्षित नारी सारे परिवार को षिक्षित कर सकती है’’। इसी लिए षिक्षित नारी ही आधुनिकता व अपनी संस्कृति में सांमजस्य अच्छी तरह बनाए रख सकती है।



 नारी का सर्वश्रेष्ठ रूप माता का है। वह बालक की गुरू, मित्र, सहयोगी बन कर उसमें अच्छे संस्कारों को पल्लवित कर सकती है। आधुनिकता की अन्धी दौड हमे किस ओर ले जायेगी, किस सीमा तक इसकी अच्छाइयों को अपनाना है, यह माता ही बता सकती है। हमारी संस्कृति के आर्दषों को बालक के अधखिले मन पर अंकुरित कर सकती है। अधिकांष महापुरूष अपनी माता द्वारा षिक्षित और प्रेरित हो कर ही महापुरूष बने है।


ऽ आधुनिक नारी को आज हर क्षेत्र में पुरूष के साथ कदम से कदम मिला कर चलने को  तैयार रहना है। ऐसी स्थिति में अन्धप्रतिर्स्पद्वा का त्याग कर के परिवार के प्रति अपने  कर्तव्य को प्राथमिकता दें।


ऽ अतिव्यस्त जीवन व टी वी संस्कृति से आपसी रिष्तों में दूरिया पैदा कर दी है। नारी अपने  विवेक से कई रीति-रिवाजों को अपना कर विभिन्न रिष्तों में सांमजस्य पैदा कर सकती है।

ऽ आज की नारी को कुरीतियों और अन्धविष्वासों को त्यागकर के व अपने आप को समाज के खौखले आर्दषों से मुक्त कर के समाज में अपना स्थान बनाना होगा ताकि उस पर आधुनिक सुसंस्कृत नारी का लेबल लग सकें।




ऽ आधुनिक नारी मिनी-स्कर्ट व जीन्स पहन कर क्लब, किटी पार्टीयों में जाकर अपने आपको आधुनिकता के भ्रम जाल में फंसा रही है। वह यह भुल रही है कि यह उसे अपनी संस्कृति से  दूर कर पतन की ओर ले जा रहा है। भड़कीली वेषभूषा पर व्यय करना उचित नहीं है। नारी हमारी संस्कृति के अनुरूप पोषाक पहनकर व मर्यादा में रह कर समन्वय रख सकती  है।


ऽ मिथ्या प्रदर्षन की भावना, फैषन की सनक, झूठी षान व अनावष्यक तृष्णा में नारी उलझी हुई है। नारी को आध्ुानिकता की इस मृग तष्णा के जाल से बाहर निकलकर हमारी संस्कृति के आर्दषों को अपनाना होगा।

ऽ टेलीविजन संस्कृति जो परिवार में आवष्यकता से अधिक पनप रही है, इसका प्रयोग सीमित करना होगा।





ऽ  आज की नारी को परिवार में आधुनिकता के साथ आध्यात्मिक व नैतिकता का वातावरण पैदा करना होगा क्योंकि आध्यात्मिक, नैतिक षिक्षा व संस्कार की जननी नारी है।

ऽ आज के युग में नारी को जो समानता का अधिकार दिया है उसको कायम रखना है। संयुक्त परिवार की रक्षा नारी कर सकती है। नारी को अपनी षक्ति को प्रयोग कर पुरू ष को व्यसनों से दूर रखना होगा। उदाहरण के तोर पर दक्षिण में महिलाओं ने षराब बन्दी आंदोलन अपने हाथो में लिया जिसका असर वहा दिखने लगा है।

ऽ नारी को वर्तमान आय के साधनों को बढ़ाने में पति का साथ देने के साथ गृहस्थ जीवन को समुचित ढ़ंग से चलाना होता है। गृहस्थ जीवन तभी सुखी रह सकता है जब परिवार के प्रति नारी अपना दायित्व समझे। हमारी संस्कृति में पत्नी व्रत व पति व्रत ग्रहस्थ जीवन के मुख्य अंग है उनका पालन करना आवष्यक है। नारी को घर चलाना होेता है इसके लिए घर का बजट आय के स्त्रोतों को देखकर बनाना चाहिए।





 इन बातों को अपने जीवन में अपना कर आधुनिक सुसंस्कारित आर्दश समाज की स्थापना में नारी अपना अमुल्य योगदान दे सकती है।  










 
  लेखिकाः-

श्रीमति भुवनेष्वरी मालोत



नोटः- यह आर्टिकल जगमग दीप ज्योति पत्रिका के बाल विषेंषाक फरवरी 2010 में छप चुका है।



                

                              






                                                      

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

हल्दी खाओ और हैल्दी रहो

             वर और वधु को विवाह के दौरान हल्दी चढाना विवाह संस्कार का महत्व पुर्ण शगुन माना जाता है और इस दोरान गणेश जी की पूजा की जाती है और वर और वधु को गीतो के साथ हल्दी के उबटन की मालिश की जाती है शरीर को निखारने की इस स्वास्थ्य परख और वैज्ञानिक परंपरा की कोई सानी नहीं है । हल्दी का महत्व सर्वविदित है अब यह केवल रसोई घर के स्वाद व रंग तक ही सीमित नहीं है अब इसका प्रयोग सौदर्य प्रसाधनो एवम् दवाईया के रूप मे भी किया जाने लगा है।




                हल्दी जिसे हम टरमेरिक एंव वनस्पति भाषा मे कुरकिमा डोमेस्टिका कहा जाता है। हल्दी हमारे देश मे बहुतायत से पैदा होती है । महाराष्ट् में इसकी खेती प्रमुख व्यवसाय के रूप में हो रही है। आज हल्दी का महत्व इस बात से सिद्ध होता है कि हल्दी के भाव आसमान छू रहे है। हल्दी मूलतः अदरक परिवार का सदस्य है।इसका कन्द जमीन मे उगता है जो कई शाखाओ में विभक्त होता है इस कन्द का पौधा सूख जाने के बाद आलू की तरह जमीन से निकाल लेते है।बाजार में उपलब्ध हल्दी को विशेष प्रकिया द्धारा तैयार किया जाताहै जमीन से निकाले गये कन्द को 12-14 घंटो तक पानी में उबाला जाता है।इस दौरान हल्दी में पाये जाने वाले स्टार्च जिलेटिन में बदल जाते है तथा हल्दी का रंग पक्का पीला होजाता है और यही हल्दी मसाले के रूप मे प्रयोग में लाई जाती हेै।

 हल्दी में कई तरह के रसायन पाये जाते है,इसमें वाष्पशील  तेल प्रमुख है।इन वाष्प तेलों में पिलेन्ड्ेन वीनेन,बोरनियोल,सिनियोल होते है,जिससे हल्दी का स्वाद तीखा हो जाता हैै।  हल्दी का पीला रंग कुरकुमिन नामक  तत्व से होता है।


  साबुत कच्ची हल्दी का प्रयोग गठिया रोगो हेतु होता है।


इसकी चटनी व अचार चाव से खाये जाते है,सब्जी भी बनाई जाती है आजकल इसका महत्व केवल रसोई घर की शोभा बढाने तक ही सीमित नही है वरन् स्वास्थ्य,सौदर्य और दवाई बनाने में भी उपयोगी साबित हुआ है ।     स्वास्थ्य, की दृष्टि से हमारे ऋषि-मुनियों ने आयुर्वेद में इसके उपयोग की विस्तृत विवेचना की है। सर्दी-खॉसी हो जानें पर दादी मॉ के नुस्खे के रूप में हल्दी की फॉकी लेने की सलाह मिलती है।फोडे -फुन्सियों से छुटकारा पाने के लिये भी हल्दी का प्रयोग किया जाता है तथा पुल्टिस के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।  यही नहीं वरन् हल्दी का उपयोग शरीर के सूजन कम करने में एलोपेथि दवाओं को पीछे छोड गई है।हल्दी लीवर की बीमारियों के लिय भी उपयोगी सिद्ध हुई है यह कफ व पित से भी राहत दिलाती हैै। यही नही अपितु  हल्दी खून को  भी साफ रखती है तथा शरीर में एन्अीबायोटिक का कार्य करती है। आज कल हल्दी कई अनुसंधान हो रहे है। हल्दी में पाया जाने  वाला कुरकुमीन का उपयोग मुंख कैसर और कैसर रसौली को गलाने में किया जाता है।
आज भी ग्रामिण क्षेत्रों में पीलिया होने  जाने पर रोगी को हल्दी से बनी माला पहनाते है।




    सौंदर्य की दृष्टि से हल्दी का उबटन सर्वविदित है आजकल हल्दी से बने कई कास्मेटिक क्रीमो का प्रयोग ब्यूटी पार्लरो मे आम होगया है। आजकल हल्दी ड्ाई  ; रंजकद्ध के रूप में भी काम लायी जाती है। विशेषकर  बीज,मिठाईयो ,उनी  और रेंशमी और बोरिक एसिड की जॉच हेतु हल्दी के टरमोटिक पेपर बनाये जाते है।


 
                                            हल्दी की बडी मांग और उॅचे दामों के कारण मिलावट से बच नहीं  पायी है। पीसी हुई हल्दी में  आजकल मिलावट के रूप मे गेरू और पिली मिट्टी मिलाई जाती है। अतः स्वास्थ्य व सौदर्य की दृष्ब्टि से मिलावट की जॉच आवश्यक है। घरेलू उपाय के रूप मे पाउडर को पानी मे घोलने पर मिट्टी नीचे जमा हो जायेगी और हल्दी उपर तैरती रहेगी ।प्रयोगशाला मे शुद्ध हल्दी की जॉच करने गॅधक का तेजाब डाला जाता है,शुद्ध हल्दी का रंग  लाल होजाता हैं
                     


    हल्दी हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है अतः हल्दी का नियमित सेवन स्वास्थ्य और सौदर्य के लिए अच्छा साबित हो सकता हैं।ऐसी गुणकारी हल्दी वंदनीय व पूजनीय है।



  नोटः-यह आर्टिकल श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत द्धारा लिखित है,जो गुजराती बोल पत्रिका के दीपोत्सव अंक 2002 में छप चुका है।   


















                             

सोमवार, 8 अगस्त 2011

टॉग खिचने की प्रवृति का त्याग करे

         

              
एक बार अर्न्तराष्ट्ीय केकडा सम्मेलन  हुआ ,उसमें कई देषों के चुनिंदा केकडे सम्मिलित हुए।सभी देष अपने -अपने देषो को बास्केट में बंद करके लाये ।इस  सम्मेलन में हिन्दुस्तान भी खतरनाक केकडो के साथ  सम्मिलित हुआ,लेकिन  हिन्दुस्तानी का बास्केट खुला था, जिससे केकडे चढकर बाहर निकलने की कोषिष कर रहे थे। एक देष के प्रतिनिधि ने कहा भाई साहब आप अपनी बास्केट बंद कर दे ,कही केकडे बाहर निकलकर काट न ले
हिन्दुस्तानी  प्रतिनिधि ने कहा भाई साहब  यह हिन्दुस्तान के केकडे है,इसमें जैसे ही एक उपर चढने का प्रयास करेगा,तो दूसरा टॉग खींचकर नीचे गिरा देगा।अतः आप निष्चित रहे।इससे यही षिक्षा मिलती है अगर आपके परिवार, समाज व आपका कोई साथी  आगे बढता है,तो उसकी टॉग खींचकर गिराने का प्रयास न करे।अगर आप आगे बढने वालो को प्रोत्साहित न कर सके तो कोई बात नहीं लेकिन उसे हतोत्साहित न करे ।आज व्यक्ति किसी को आगे बढता हुआ देखता है,तो खुषी की जगह ईष्या  होती है।भाई-भाई पडौसी -पडौसी ,मित्र-मित्र को आगे बढता हुआ नही देख सकता है।इसलिए वह व्यक्ति की आलोचना करता है।उसके बारे मे अफवाह फैलाता है।इससे उसको आत्मसंतुष्टिी जरूर होती है,लेकिन इससे आगे बढने वालो को कोई  फर्क नहीं होता है।आगे बढने वाला अवष्य ही आगे बढेगा।अतः इस प्रवृति का त्याग करे।   

                                          






                                           श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
                                     

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

निस्वार्थ सेवा सच्ची सेवा है



     नेकी कर कुए में डाल




फंलेमिग नाम का एक किसान स्कांटलैड में अपने खेत में काम कर रहा था कि अचानक उसने सहायता के लिए पुकारती एक आवाज सुनी, उसने पास जाकर देखा तो एक छोटा बच्चा गहरे कीचड मे फॅसा हुआ है




 उसने बडी मेहनत करके,उसे निकाला और फिर अपने काम में जुट गया। दूसरे दिन उसने देखा एक अमीर आदमी उसकी झोंपडी में आया ओैर बोला तुमने मेरे बेटे की जान बचायी है मैं तुम्हें इनाम देना चाहता हुं । किसान ने इनाम लेने से इंनकार कर दिया और कहा यह तो मेरा कर्तव्य है। उसने किसान के पास खडे उसके फटेहाल बच्चे को देखा और कहा इसकी शिक्षा की जिम्मेदारी में उठाता हुं ,तुम उसे मुझे सौंप दो ।


कई वर्षो बाद वही बालक अलेग्जैन्डर फंलेमिंग प्रसिद्व वैज्ञानिक पैनिसिलीन का अविष्कारक बना। कुछ समय बाद उसका बेटा निमोनिया का शिकार हो गया,जिसकी जान पैनिसिलीन की  वजह से बची। उस आदमी का नाम लार्ड रैन्डोल्फ था और उसके बेटे का नाम सर विन्सटन चर्चिल।

 यह सही बात है जैसा तुम देते हो वैसा ही तुम्हें वापिस मिलता है चाहे थोडा वक्त जरूर लगता है पर प्रकति अपने पास कुछ नही रखती है व आपको खाली हाथ नही रहने देगी  आपकी अच्छाई वापिस लौटकर आपके पास जरूर आयेगी ।


 आओ दुआ करे और इसे हम जीवन का आर्दश बना ले कि नेकी किसी फल के लिए नही बल्कि आंतरिक खुशी के लिए करेगें और भूल जायेगे ।

                                 श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत

  
           मेरे द्धारा लिखित    यह आर्टिकल दैनिक भास्कर के मधुरिमा में 23 जून 2009 में एक दुआ अपने लिए     में छप चुका है।




मंगलवार, 2 अगस्त 2011

तलाक एक मानसिक रोग है


                         हिन्दुओं में विवाह को एक संस्कार माना है जो अपने में कई संस्कारों को छुपाये हुये है यह जन्मजन्मातर का बंधन है
विवाह से पहले प्यार प्रथम होता है,लेकिन विवाह के बाद प्राथमिकताए बदल जाती है पति पत्नि मन प्राण से दूध मे पानी की तरह घुल जाते है धीरे-धीरे इन संबधो में परिपक्वता आ जाती है लेकिन पति पत्नि नौकरी पैशा है, बच्चे छोटे है या अन्य कोई मानसिक या शारिरीक उलझने है  तो वह उसमे उतना व्यस्त होजाते है कि उन्हेें अपने वैवाहिक संबधोे के लिए समय ही नही मिल पाता है धीरे -धीरे इनके संबधो मेेें अल्पविराम लगने लगता है एक दिन यह अल्पविराम, विराम का अर्थात तलाक का रूप धारण कर लेता है,इसलिए  इन संबधो को संवारने के लिए निरंतर खाद पानी की जरूरत रहती है।नही तो वैवाहिक बंधन की पवित्र उॅचाई से तलाक की गहरी खाई मे गिरने में जरा भी समय नही लगेगा।


ऽ दोनो में से किसी का शक्की मिजाज दांपत्य में 
                       
 दरार पैदाकर सकता जिससे तलाक जैसी स्थिति आसकती 
है।
   ऽ पति का पत्नि के प्रति निर्मम,कठोर,हिंसापूर्ण व्यवहार व शोषण भी तलाक का कारण हो सकता हैं
    ऽ दांम्पत्य के रिश्ते मे ंप्यार सम्मान गरिमा व भरोसे की मजबूत दीवार      जब गिर जाती हैतो तलाक की नौबत आजाती है।
   ऽ संवादहीनता भी दांपत्य जीवन को ंनीरस बना कर अलगाव की स्थिति उत्पन्न कर देती है।
ऽ तृप्त यौन सुखी दांपत्य की कुंजी है, इसे नजरअंदाज करने से दांपत्य जीवन मे तलाक की स्थिति बन सकती है।
ऽ एक दूसरे के अहम आपस मे टकराते हैऔर कोई भी समझौता करने के लिए तैयार नही होता तब तलाक की स्थिति बनती है।



 

आधुनिक समाज में तलाक तेजी से बढ रहे है, बढते तलाक के लिए कई कारण जिम्मेदार हैःजिसमे बेवफाई,किसी एक का छोड कर चले जाना ,किसी एक का लाइलाज रोग से पीडित होना  पुरूषत्वहीनता ,सांस्कृतिेक जीवन शैली में मतभेद व संस्कारहीनता,आपसी समझ का अभाव,प्रतिस्पृ़द्धी प्रवृति,मानसिक अस्थिरता आदि कुछ मुख्य है

दांपत्य का रिश्ता सृष्टि का संुदरतम् रिश्ता है,छोट-मोटी  समस्या तो हर वैवाहिक जीवन में आती है इन समस्याओंसे निकलना ही जिंदगी है, हमेशा इस रिश्ते में प्यार व विश्वास की मजबूत दीवार को कायम रखे ।




श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत






 यह आर्टिकल       जगमग दीप ज्योति नामक पत्रिका की परिचर्चा    ब ढते तलाक की समस्या   में जनवरी 2011 में छप चुका है