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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

जरा अपनी और भी निहारिये

 कहा जाता है कि हमारा मन एक आईना है सबसे पहले हमे इसमें देखना चाहिये ,लेकिन इंसान की फितरत होती है कि कभी वह अपने दिल में  झाक कर नही देखता है ।हमेषा दूसरो के दिलो में झाकने   की कोषिष करता है जो असंभव है।
भैंस व  गाय पक्की सहेलीयॉ थी लेकिन भैंस
 काली थी और गाय सफेद ,सिर्फ उसकी पूॅछ का हिस्सा
काले रंग का था  ।एक दिन भैंस ने गाय से कहा सखी बुरा मत मानना तुम में सभी प्रकार के गुण है किन्तु एक दोष है। बहन तुम्हारी पॅूछ काली है। गाय ने निडर होकर मुस्कराहट के साथ कहा श्देखो सखी तुम सही कहती हो मेरी तो पॅूछ ही काली है लेकिन तुम तो सारी की सारी काली हो 



               सभी मनुष्यो में कुछ न कुछ कमियॉ रहती ही है ।हम में भी कई दोष व अवगुण भरे हुए है लेकिन अपने दोषों की और ऑखे मॅूद लेते है और हमेषा दूसरो के अवगुणों एव दोषों को ढूढते रहते है।

हमें दूसरों के अवगुणो को देखने के बजाय उसके गुणोे को अपना कर व अपने गुणो की खोज में लग जाना चाहिये ताकि स्ंवय में उन गुणो को बढाकर अपने विरोधी को परास्त कर सके।कबीरदास जी कहते हैकि:- बुरा देखन मैं चल्या बुरा न मिल्या कोई,जो दिल खोज्या आपणा मुझसा बुरा न कोई।


श्रीमति भुनेष्वरी मालोत


सोमवार, 25 जुलाई 2011

बुर्जग घर की रौनक है

           

       बुर्जग शब्द दिमाग में आते ही उम्र व विचारों से परिपक्व व्यक्ति की छबि सामने आती है। बुर्जग अनुभवो का वह खजाना है जो हमें जीवन पथ के कठिन मोड पर उचित दिशा निर्देश करते है।परिवार के बुर्जग लोगो में नाना-नानी,दादा-दादी मॉं-बाप,सास-सुसर आदि आते   बुर्जग घर का   मुखिया होता है इस कारण वह बच्चों,बहुओं,बेटे-बेटी को कोई गलत कार्य या बात करते हुए देखते है तो उन्हें सहन नहीं कर पाते है और उनके कार्यो में हस्तक्षेप करते है जिसे वो पसंद नहीं करते है।वे या तो उनकी बातों को अनदेखा कर देते है या उलटकर जबाब देते है। जिस बुर्जग ने अपनी परिवार रूपी बगिया के पौधों को अपने खून पसीने रूपी खाद से सींच कर पल्लवित किया है, उनके इस व्यवहार से उनके आत्म-सम्मान को ठेस पहुची है। 




  एक समय था जब बुर्जग को परिवार पर बोझ  नहीं बल्कि मार्ग-दर्शक समझा जाता था। आधुनिक जीवन शैली,पीढीयों में अन्तर ,आर्थिक-पहलू ,विचारों में भिन्नता आदि के कारण आजकल की युवा पीढी निष्ठुर और कर्तव्यहीन होगई है।जिसका खाम्याना बुर्जग को भुगतना पडता है। बुर्जगों का जीवन अनुभवों से भरा पडा है, उन्होंने अपने जीवन में कई धूप-छॉंव देखे है जितना उनके अनुभवो का लाभ मिल सके लेना चाहिए। गृह-कार्य संचालन में मितव्यता रखना, खान-पान सबंधित वस्तुओं का भंडारण, उन्हे अपव्यय से रोकना आदि के संबध में उनके अनुभवों को जीवन में अपनाना चाहिए जिससे वे खुश होते है और अपना सम्मान समझते है।  


  बुर्जग के घर में रहने से नौेकरी पेशा माता-पिता अपने बच्चों की देखभाल व सुरक्षा के प्रति निश्चिंत रहते है।उनके बच्चों में बुर्जग के सानिध्य में रहने से अच्छे  संस्कार पल्लवित होते है। 

 बुर्जगोें को भी उनकी  निजी जिंदगी में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करना चाहिया। उनके रहन-सहन, खान-पान, घूमने-फिरने आदि पर रोक-टोक नहीं होनी चाहिए। तभी वे शांतिपूर्ण व सम्मानपूर्ण जीवन जी सकते है। बुर्जगों में चिडचिडाहट उनकी उम्र का तकाजा है। वे गलत बात बर्दाश्त नही कर पाते ह,ै इसलिए परिवार के सदस्यों को उनकी भावनाओं व आवश्यकता को समझकर ठडे दिमाग से उनकी बात सुननी चाहिए। कोई बात नहीं माननी हो तो, मौका देखकर उन्हें इस बात के लिए मना लेना चाहिए कि, यह बात उचित नहीं है। सदस्यों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई ऐसी बात न करे जो उन्हें बुरी लगे ।बुर्जगों के साथ दुव्यवहार करने से घर में अशांति बनी रहती है। इस जीवन संध्या में उन्हें आदर व अपनेपन की जरूरत है। इनकी छत्रछाया से हमारी सभ्यता व संस्कृति जीवित रह सकती है। बच्चों को अच्छे संस्कार व स्नेह मिलता है।

बालगंगाधर तिलक ने एक बार कहा था कि‘तुम्हें कब क्या करना है यह बताना बुद्धि का काम है,पर कैसे करना है यह अनुभव ही बता सकता है।’

अंत में ‘फल न देगा न सही,  
              छाव तो देगा तुमको 
पेड बुढा ही सही   
 आंगन में लगा रहने दो।
नोटः-यह आर्टिकल जतन से ओठी चदरिया जिसके संपादक डॉ0ए0 कीर्तिव़र्द्धन  ने अंतर्राष्ट्ीय वृद्ध वर्ष 2009पर वृद्ध भारत का साक्ष्य है में छप चुका है।

बुधवार, 20 जुलाई 2011

बढते बच्चे और आप

                     
   आज में अचानक ही मेरी सहेली से मिलने उसके घर गयी, हम गपशप कर ही रहे थे कि हमारे पास बैठा उसका 14 साल का बेटा अजीब से सवाल पूछ रहा था। जिसका जवाब मेरी सहेली ठीक से नहीं दे पा रही थी और वह सोच रही थी कि ये अपने दोस्तों की संगत में बुरी बाते सीख रहा है लेकिन मैने कहा कि तुम गलत हो, तुम्हारा बेटा उम्र के उस मोड पर खडा है जिसमें उसमें शारीरिक परिवर्तन होना संभावित है इसकी जानकारी तुम्हे स्वंय अपने बेटे को देनी चाहिए।
बढ़ते बच्चों को समझे:-

 बढ़ती उम्र में बच्चों के लिए दोस्त ही सब कुछ होते है और वे सैक्स के बारे में अधपका ज्ञान एक दूसरे से शेयर करते है। ऐसे समय में माता-पिता ही बच्चों को बता सकते है कि क्या गलत है क्या सही है। जब इस उम्र में बच्चा स्कूल से घर आता है तो घर में किसी बडे का होना जरूरी है। उससे स्कूल की बाते शेयर करे, अच्छे कार्य के लिए प्रोत्साहित करें और गलत चीज का एकदम विरोध न कर,ें न ही डाटे, धीरे धीरे अपने विश्वास में लेेकर उन्हे ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए, इसके बारे में समझाये।
रिश्तों की सीमा व अहमियत के बारे में बताऐ:-

 बढ़ती उम्र में बच्चों का वास्ता स्कूल, परिवार, दोस्त, ट्यूशन के साथी, टीचर और खेल के मैदान के साथी आदि कई लोगों से पड़ता है। आप उन्हे सही व गलत रिश्ते की पहचान बताऐ और समझाये कि आधुनिक युग में रिश्ते व दोस्ती की परिभाषा ही बदल गयी है। जिंदगी के सफर में नये रिश्ते बनते जायेगे, पुराने छुटते जायेंगे, किसी से स्थाई संबंध बनाने के लिए बहुत समझदारी से प्रयास करना पड़ता है।
अच्छे बुरे अनुभव बच्चों के साथ शेयर करें:-
 माता-पिता को अपनी जिंदगी के अच्छे बुरे अनुभव बच्चों के साथ बांटने चाहिए जिससे बच्चों को कुछ सीखने की प्रेरणा मिलेगी साथ ही माता-पिता अपनी लाडली बिटिया व लाडले बेटे से स्कूल व दोस्तों के साथ घटित खास अनुभव के बारे में पूछ सकते है। इससे आपको उनके मन में क्या चल रहा है और साथ ही किस तरह के दोस्त है इसकी जानकारी मिल सकती है।
प्यार के सही मायने बताऐ:-


आजकल बच्चों पर टीवी व फिल्मो का गहरा प्रभाव होता है उनको इस बात का अहसास दिलाना होगा कि प्यार विपरित लिंग के अलावा मॉ-बाप, भाई-बहिन से भी होता है। उनको प्यार से समझाना होगा कि बढ़ती उम्र में तुम जो प्यार का मतलब निकाल रहे हो वो सिर्फ शारीरिक आर्कषण है, स्थाई प्यार नहीं ।यही से दोनों बीच टकराव शुरू
हो जाता है। बच्चे अपनी मरजी से जीना चाहते है और वे मॉ-बाप के नियन्त्रण को बर्दाश नहीं कर पाते है।

अपने लाड़ले व लाड़ली से दोस्ताना व्यवहार रखे:-  
 अगर माता-पिता अपने बच्चों के साथ एक दोस्त की तरह व्यवहार करेंगे तो वे आपको अपनी ज्यादातर बाते बतायेंगे यदि आप उसे डाटेंगे या उसकी बात का विरोध करेंगे तो वे आप से अपनी बाते शेयर नहीं करेंगे। उन्हे समझाये कि हर चीज की एक उम्र होती है, पाश्चात्य संस्कृती की नकल में कही गलत व्यक्ति के चक्कर में पड़ कर अपनी जिंदगी बर्बाद कर सकते है। इस उम्र के लव अफेयर केवल शारीरिक आर्कषण ही होता है। 
बिटिया और आप:- 



 

 आपको पता ही नही चला कि जो कल तक आपकी नन्ही लाडली आपके आंचल का सहारा लेकर चलती थी न जाने कब बड़ी हो गयी । मां की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मां का कृर्तव्य है कि वह अपनी बेटी को उम्र के अलग- अलग मोड पर किस तरह से व्यवहार करना है सिखाए। सही व गलत व्यक्ति की पहचान बताऐ। कॉलेज व स्कूल में अपने साथीयों व अध्यापको से, प्रोफेसर से, ऑफिस में बोस से, साथ ही कर्मचारीयों से सुसराल में पति, देवर, जेठ से किस मर्यादा में रहकर व्यवहार करना है इसका ज्ञान दे, जिंदगी की किताब का यह पाठ  एक मां ही अपनी बढ़ती उम्र की बेटी को बेहतर ढग से  पढ़ा सकती

सैक्स ज्ञान व आपका बच्चा:-
 यदि आपका बच्चा 14 साल से ऊपर की उम्र का है तो उसे बातों ही बातों में शारीरिक बदलाव के बारे में जानकारी देते हुऐ समझा सकते है कि सैक्स की एक उम्र होती है अभी इन चीजों से दूर रहकर अपना ध्यान पढ़ाई व अपने केरियर पर रखना है। यही से बच्चे के जीवन का प्रवेश द्वार शुरू होता है। बच्चों को सैक्स से संबन्धित होने वाले रोग जैसे एड्स आदि की जानकारी दे सकते है और उन्हे अच्छा साहित्य पढ़ने को दे सकते है जिससे उन्हे सही जानकारी मिल सके।
 आधुनिक बनना जरूरी है, स्वतन्त्रता भी जरूरी है। पुरानी मान्यताओं व रूढियों का विरोध करना भी जरूरी है लेकिन यह सब एक सीमा में रह कर करना होगा। वेलेन्टाइन डे 31 दिसम्बर आदि का सहारा लेकर हमारे लाडले, लाडली आनन्द उत्सव मनाने के लिए जो महफिले सजाते है उसमें न जाने कितनी लाडलियां अपनी अस्मत खो देती है और कितने लड़के नशे में एक्सीडेन्ट करते है।
बढ़ती उम्र के बच्चों को सही मार्ग दर्शन व प्यार जरूरी है जो उन्हे मां बाप ही दे सकते है।

 

 नोट‘ः-  लेखिका -श्रीमति भुनेष्वरी मालोत    यह आर्टिकल  नई दुनिया -नायिका  में 23 फरवरी 2011 को छप चुका है।




शनिवार, 16 जुलाई 2011

मिठाई बनाने के घरेलु नुस्खे

                                                                    


                                   घर मंे कोई पार्टी हो या कोई त्यौहार हा,े बिना मिठाईयों व मनभावन पकवानो के पार्टी या त्यौहार का मजा अधूरा रहता है।फिर घर में अपने हाथ से बनी हुई मिठाईया हो तो क्या कहना, मेहमान भी  बिना तारीफ किये हुए नहीं रहेगे।मिठाई बनाते समय कुछ बातों का ध्यान का रखा जाय ता,े गृहणी कई परेशानी का  सामना करने से बच सकती है।


 बेसन,मावा,रवा या कुछ भी मिठाई बनाने सम्बन्घी वस्तु कम ऑंच पर सेके।

 चाशनी पानी के बजाय दूध में बनाए जाने पर ज्यादा स्वादिष्ट मिठाई बनती है।
 चाशनी बनाते समय उसमें थोडी मात्रा में दूध डालकर शक्कर की गंदगी को साफ कर लेना चाहिए।
 किसी भी तरह की बर्फी बनानी हो तो गैस पर से उतारने के बाद थोडी देर तक कडाई में अच्छी तरह से हिलाए,इससे बर्फी अच्छी बनती है।

 बर्फी थाली में डालते समय घी की जगह तेल लगाने से बर्फी जल्दी निकलेगी ।
 

 इलायची,जायफल,एसेंस या कोई सुगन्धित पदार्थ यदि मिठाई में डालना है, तो वह मिठाई ठडी होने पर डाले ।
 नारियल की बर्फी बनाते समय नारियल और दूध को मिक्सर में 2-3बार चलाने के बाद बर्फी बनाए,अच्छी बनेगी।
 नये टूथ-ब्रश पर कोई भी रंग खानेवाला लगाकर ब्रश को हल्के हाथ से दबाए, इससे बर्फी पर रंग फेैल जायगा और बर्फी विशेषकर मावे की सुंदर दिखाई देगी।

 बेसन के लड्डू बनाने हो तो, बेसन रवादार होना चाहिए ताकि मुॅंह में चिपके नहीं।
 रवे के लड्डू बनाते समय रवा सूजी महीन होना चाहिए।
 लड्डू में घी डालते समय घी ज्यादा गरम न करे सिर्फ हल्का गला ले।




 खीर बनाते समय दूध में खस-खस के दाने पीसकर डालने और शक्कर अन्त में डालने से खीर स्वादिष्ट बनेगी।

 कस्टर्ड बनाते समय उसमें एक चम्मच शहद मिलाने से स्वाद और सुंगध में वृद्धि होती है।
 मालपुए का घोल बनाते समय तथा हलुआ बनाते समय गर्म पानी का उपयोग करना चाहिए।

                 इन टिप्स को आजमाकर मिठाईयों का जायका बढाया जा सकता है और बदले में मेहमानो से प्रंशसा रूपी मिठाई पाई जा सकती है।
                    



नोट- लेखिका -भुनेष्वरी मालोत यह आर्टिकल राजस्थान पत्रिका में दीपावली अंक  24 अक्टूम्बर 2003 में छप चुका है।
















बुधवार, 6 जुलाई 2011

वस्त्र-दान का अनुठा अभियान


 पुरूषो को जन्म देनेवाली नारी कमजोर व असहाय होती जा रही है,कई बहनो को तन ढकने के कपडे मुहैया नही हो पाते है,इन अबला नारियो की नारकिय हालत तब होती है जब वह गर्भवती माता बन जाती है।यह कमजोर मॉ गर्भणी बन जाने पर कैसे सुरक्षित प्रसुति करायेगी यह विचारणीय प्रश्न है। प्रसुति होने पर अपने सीमित संसाधनो से वह अपने शरीर तक को ढक नही पाती है।इस कहानी का ज्वलंत रूप तब देखने को मिलता है जब आप प्रसुति -वार्ड में जाकर देखे तो प्रसुता के कपडे तो प्रसुति के दौरान खून से सन कर खराब हो गये है ,दूसरा वस्त्र या साडी शरीर को ढकने को नही है मॉ अर्धनग्न सरकारी कम्बल में लिपटी पडी है,पास ही नवजात शिशु दिगम्बर की तरह फटे पुराने तौलिये में लिपटा हुआ मॉ के बगल में सिमटकर पडा हुआ है,जिस पर नवजात शिशु को पहनाने को कुछ नही है।ऐसे कई दृष्य मानवता को झकझोर देते है ।इस पीडा को हम सब मिलकर सम्मिलित प्रयास से कम कर सकते है।आइये इस मुहिम मे महिलाओ से महिलाओ को सहयोग कर अबला का तन ढककर उसे सबल बनावे



 प्रत्येक महिला और विशेषकर सभा्रंत परिवारो की महिलाओ के पास साडी ,ब्लाउज ,पेटीकोट बहुतायत में होते है और वह साडियो की जमाखोरी करती जाती है।बदलते फैशन के दौर में बेकार समझकर उसे समेट कर आलमारी मे जमा करती जाती है,कई साडियो को बार-बार पहनने से महिलाओ के मन भर जाते है ।आजके पालिस्टर के जमाने मे पहले की तरह साडिया कम फटती है,वैसी की वैसी रहती है मात्र उनका रंग फिका पड जाता है,जिसे हम मन व तन से उतार फैक कर अलमारी की शोभा बढाने रख देते है । कुछ बहने पुरानी साडियो के बदले फैरी वालों से प्लाटिक टब या बाल्टिया या फिर स्टील के बरतन बदले में लेकर खुश होती हैै। आईये इस छोटी सी लाभ प्रवृति को त्यागे ,इस छोटे से लालच के बदले हम इन वस्त्रों को जरूरतमंद को भेंट कर पुण्य कमाये ,निसंदेह मानवता दुहाई देगी।





आवश्यकता है इन साडियो में से बची हुई कुछ साडियो को प्रसुताओ तक पहुचाये जो इसकी मोहताज है,उनके तन को ढककर सकुन पाये ,सेवा के इस प्रकल्प में कोई खर्चा नही है,मात्र महिलाओ में सोयी हुई चेतना को जगाकर उसे सही राह दिखानी है।आप स्ंवय भी सरकारी चिकित्सालय के प्रसुति -वार्ड में जाकर जरूरतमंद को अपने हाथो से वस्त्र दे सकती है या फिर महावीर इन्टरनेशनल बॉंसवाडा की वीरा बहनो को सूचित कर उन तक पहुचा सकती है। महावीर इन्टरनेशनल की वीरा बहनो द्वारा नियमित रूप से यह प्रकल्प चलाया जा रहा है मानवता के इस पुनित यज्ञ में आप भी अपने हाथो से साडी देकर पुण्य और दुआ कमाये ।इस तरह की सकारात्मक सोच से हम कई लोगो को बिना रूपया-पैसा खर्च किये राहत दिला सकते है ।आओ हम सब मिलकर अपने पवित्र हाथो से पुण्य लाभ का शुभारंभ करे।


























रविवार, 3 जुलाई 2011

चिराग जलाये, चिराग बुझाये नहीं

   मुझे एक जन्मदिन पार्टी मे जाने का अवसर मिला,देखा चारों और अच्छी खासी भीड थी। रंग-बिरंगी गुब्बारे से खुब सजावट की गयी थी,अंग्रेजी गाने चल रहे थे ,एक बडी टेबल पर ब्र्र्रडी सी केक रखी थी उस पर एक मोमबती जल रही थी जिसके पास चाकू भी रखा हुआ था,मॉ ने बच्चे को फॅुक मरवाकर मोमबतीया बुझा दी ,जोरदार तालियॉ बजी ,केक काटा ,केक बटने लगा,सभी बच्चे को उपहार व लिफाफा देकर खाने की मेज पर लपके ।

           पहले भी जन्मदिन मनाया जाता था,सूरदास कृष्ण-लीला का वर्णन करते हुये कहते हैकि यशोदा मैया कहती है‘-‘‘ आज मेरे ललन की पहली बरस गॉठ रे।’’पहले मॉ जन्मदिन पर बच्चे के सिर पर एक चम्मच दूध दही व शक्कर को मिलाकर स्नान कराती थी ।गर्म-गर्म हलवा का  भगवान को भोग लगाया जाता था यही बच्चे के लिए प्रसाद व आर्शीवाद होता था ,साथ ही भगवान के सामने  बच्चे की दीर्घायु व मंगलकामना के लिए दिया जलाया जाता था। बच्चा सभी बडो के पॉव छूकर आर्शीवार्द लेता था ।


        हमारी संस्कृति दिया जलाने की है,बुझाने की नही।घर के लडके को घर का चिराग कहा गया है, किसी के घर मे बेटा मर जाता है तो कहते है,धर का चिराग बुझ गया ,साथ ही जलता हुआ दिया बुझ जाता है तो अपशकुन माना जाता है और अग्नि को फॅूक मारकर जलाया या बुझाया नही जाता है फिर जन्मदिन पर जलती हुई रोशनी को क्यों बुझाया जाता है यह विचारणीय पहलू है।
        हमारी संस्कृति जोडने की है काटने की नही,िफर इस शुभ दिन पर केक को चाकू से काटकर लोगो का मुॅह मीठा करवाया जाता है,हॉलाकि केक अच्छा है,पर अपना हलवा क्या बुरा है।
       हमारी संस्कृति मे जीवेम शरदः शतम् का आशीवार्द देते है,जबकि आधुनिक युग में हर एक जन्मदिन पर सिर्फ एक साल के लिए दुआ मॉगते है।