Google+ Followers

बुधवार, 24 अगस्त 2011

मधुमेह रोगी के लिए-अंकुरित मैथी व गेंहू के खाखरे

           
 
  

 
vadqfjr eSFkh





   सामग्रीः-

एक कटोरी  अंकुरित गेंहू का आटा] आधी

कटोरी अंकुरित मैथी का आटा]मोयन के लिए तेल

 एकचम्मच]अजवाइन]नमक स्वादानुसार

आधचम्मच हल्दी] आधा चम्मच मिर्चं A



   विधि 

      गेंहू व मैथी को अलग अलग 7से 8 घंटे

 भिगोकर उसे कपडे में बाध कर 12से 14 घंटे के

 लिए अंकुरित होने के लिए रख दे ।अंकुरित होने


पर धूप में सूखा दे ।फिर उसका आटा तैयार

 करके दोनो आटे मिलाकर उसमें अजमाइन तेल 

]नमक हल्दी मिर्च सारी सामग्री मिलाकर।आटा

 गॅुथ ले फिर उस आटे से पतले -पतले खाखरे
बनाकर तवे पर सेक ले।


इसे एयर टाईट डिब्बे में रखे ।8से 10दिन
 तक इसको काम मे ले सकते ।

यह मधुमेह के रोगी के लिए कई

पSf"Vक तत्वो से भरपूर है।इस

मधुममेही खाखरे मे ग्लायेसेमिक

 इण्डेक्स कम है अतः 'kqगर की मात्रा बराबर बनी

 रहती है।

  श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत






रविवार, 21 अगस्त 2011

आधुनिक और पुरातन में समन्वय - नारी कैसे करे


                                                                

        
भारतीय संस्कृति की सर्वोपरि विषेषता समन्वय रखना है। भारतीय नारी संस्कृति के इसी गुण को अपना कर आधुनिक व पुरातन संस्कृति के बीच समन्वय बीठा सकती है। समन्वय आधुनिक व पुरातन संस्कृति के बीच आवश्यक है, संस्कृति चेतन है, जड़ नही। भारतीय संस्कृति में नारी को दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती के रूप में दर्शाया गया है। गणेश जी के लिए कहा जाता है कि वे सरस्वती के लिपिक रहे है। इसी से यह प्रदशित होता है कि नारी का प्रभाव किसी भी प्रकार से पुरूष से कम नहीं है।



                    सदियों से नारी के कार्य क्षेत्र को परिवार तक सीमित रखकर उसे परिवार की इच्छाओं व आंकाक्षाओं के लिए हर पल त्याग की उम्मीद की जाती है। घर की धूरी मानी जाने वाली नारी को हर क्षेत्र में अपने आप को आधुनिक कहलाने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।  आधुनिक शिक्षा ने नारी को महत्वकांक्षी बना दिया है। प्रतिर्स्पद्वा की दौड़ में वह अपने परिवार व बच्चों को भूल कर पुरूषों से आगे निकल जाना चाहती है, लेकिन अपनी संस्कृति को कायम रखने की उम्मीद नारी से ही की जाती है। आज की नारी कुछ बातों को ध्यान में रखकर दोनों में सांमजस्य स्थापित कर सकती है।



 सर्वप्रथम नारी को शिक्षित हो कर आत्म निर्भर होना होगा। महात्मा गांधी का कथन है कि ‘‘एक शिक्षित नारी सारे परिवार को षिक्षित कर सकती है’’। इसी लिए षिक्षित नारी ही आधुनिकता व अपनी संस्कृति में सांमजस्य अच्छी तरह बनाए रख सकती है।



 नारी का सर्वश्रेष्ठ रूप माता का है। वह बालक की गुरू, मित्र, सहयोगी बन कर उसमें अच्छे संस्कारों को पल्लवित कर सकती है। आधुनिकता की अन्धी दौड हमे किस ओर ले जायेगी, किस सीमा तक इसकी अच्छाइयों को अपनाना है, यह माता ही बता सकती है। हमारी संस्कृति के आर्दषों को बालक के अधखिले मन पर अंकुरित कर सकती है। अधिकांष महापुरूष अपनी माता द्वारा षिक्षित और प्रेरित हो कर ही महापुरूष बने है।


ऽ आधुनिक नारी को आज हर क्षेत्र में पुरूष के साथ कदम से कदम मिला कर चलने को  तैयार रहना है। ऐसी स्थिति में अन्धप्रतिर्स्पद्वा का त्याग कर के परिवार के प्रति अपने  कर्तव्य को प्राथमिकता दें।


ऽ अतिव्यस्त जीवन व टी वी संस्कृति से आपसी रिष्तों में दूरिया पैदा कर दी है। नारी अपने  विवेक से कई रीति-रिवाजों को अपना कर विभिन्न रिष्तों में सांमजस्य पैदा कर सकती है।

ऽ आज की नारी को कुरीतियों और अन्धविष्वासों को त्यागकर के व अपने आप को समाज के खौखले आर्दषों से मुक्त कर के समाज में अपना स्थान बनाना होगा ताकि उस पर आधुनिक सुसंस्कृत नारी का लेबल लग सकें।




ऽ आधुनिक नारी मिनी-स्कर्ट व जीन्स पहन कर क्लब, किटी पार्टीयों में जाकर अपने आपको आधुनिकता के भ्रम जाल में फंसा रही है। वह यह भुल रही है कि यह उसे अपनी संस्कृति से  दूर कर पतन की ओर ले जा रहा है। भड़कीली वेषभूषा पर व्यय करना उचित नहीं है। नारी हमारी संस्कृति के अनुरूप पोषाक पहनकर व मर्यादा में रह कर समन्वय रख सकती  है।


ऽ मिथ्या प्रदर्षन की भावना, फैषन की सनक, झूठी षान व अनावष्यक तृष्णा में नारी उलझी हुई है। नारी को आध्ुानिकता की इस मृग तष्णा के जाल से बाहर निकलकर हमारी संस्कृति के आर्दषों को अपनाना होगा।

ऽ टेलीविजन संस्कृति जो परिवार में आवष्यकता से अधिक पनप रही है, इसका प्रयोग सीमित करना होगा।





ऽ  आज की नारी को परिवार में आधुनिकता के साथ आध्यात्मिक व नैतिकता का वातावरण पैदा करना होगा क्योंकि आध्यात्मिक, नैतिक षिक्षा व संस्कार की जननी नारी है।

ऽ आज के युग में नारी को जो समानता का अधिकार दिया है उसको कायम रखना है। संयुक्त परिवार की रक्षा नारी कर सकती है। नारी को अपनी षक्ति को प्रयोग कर पुरू ष को व्यसनों से दूर रखना होगा। उदाहरण के तोर पर दक्षिण में महिलाओं ने षराब बन्दी आंदोलन अपने हाथो में लिया जिसका असर वहा दिखने लगा है।

ऽ नारी को वर्तमान आय के साधनों को बढ़ाने में पति का साथ देने के साथ गृहस्थ जीवन को समुचित ढ़ंग से चलाना होता है। गृहस्थ जीवन तभी सुखी रह सकता है जब परिवार के प्रति नारी अपना दायित्व समझे। हमारी संस्कृति में पत्नी व्रत व पति व्रत ग्रहस्थ जीवन के मुख्य अंग है उनका पालन करना आवष्यक है। नारी को घर चलाना होेता है इसके लिए घर का बजट आय के स्त्रोतों को देखकर बनाना चाहिए।





 इन बातों को अपने जीवन में अपना कर आधुनिक सुसंस्कारित आर्दश समाज की स्थापना में नारी अपना अमुल्य योगदान दे सकती है।  










 
  लेखिकाः-

श्रीमति भुवनेष्वरी मालोत



नोटः- यह आर्टिकल जगमग दीप ज्योति पत्रिका के बाल विषेंषाक फरवरी 2010 में छप चुका है।



                

                              






                                                      

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

हल्दी खाओ और हैल्दी रहो

             वर और वधु को विवाह के दौरान हल्दी चढाना विवाह संस्कार का महत्व पुर्ण शगुन माना जाता है और इस दोरान गणेश जी की पूजा की जाती है और वर और वधु को गीतो के साथ हल्दी के उबटन की मालिश की जाती है शरीर को निखारने की इस स्वास्थ्य परख और वैज्ञानिक परंपरा की कोई सानी नहीं है । हल्दी का महत्व सर्वविदित है अब यह केवल रसोई घर के स्वाद व रंग तक ही सीमित नहीं है अब इसका प्रयोग सौदर्य प्रसाधनो एवम् दवाईया के रूप मे भी किया जाने लगा है।




                हल्दी जिसे हम टरमेरिक एंव वनस्पति भाषा मे कुरकिमा डोमेस्टिका कहा जाता है। हल्दी हमारे देश मे बहुतायत से पैदा होती है । महाराष्ट् में इसकी खेती प्रमुख व्यवसाय के रूप में हो रही है। आज हल्दी का महत्व इस बात से सिद्ध होता है कि हल्दी के भाव आसमान छू रहे है। हल्दी मूलतः अदरक परिवार का सदस्य है।इसका कन्द जमीन मे उगता है जो कई शाखाओ में विभक्त होता है इस कन्द का पौधा सूख जाने के बाद आलू की तरह जमीन से निकाल लेते है।बाजार में उपलब्ध हल्दी को विशेष प्रकिया द्धारा तैयार किया जाताहै जमीन से निकाले गये कन्द को 12-14 घंटो तक पानी में उबाला जाता है।इस दौरान हल्दी में पाये जाने वाले स्टार्च जिलेटिन में बदल जाते है तथा हल्दी का रंग पक्का पीला होजाता है और यही हल्दी मसाले के रूप मे प्रयोग में लाई जाती हेै।

 हल्दी में कई तरह के रसायन पाये जाते है,इसमें वाष्पशील  तेल प्रमुख है।इन वाष्प तेलों में पिलेन्ड्ेन वीनेन,बोरनियोल,सिनियोल होते है,जिससे हल्दी का स्वाद तीखा हो जाता हैै।  हल्दी का पीला रंग कुरकुमिन नामक  तत्व से होता है।


  साबुत कच्ची हल्दी का प्रयोग गठिया रोगो हेतु होता है।


इसकी चटनी व अचार चाव से खाये जाते है,सब्जी भी बनाई जाती है आजकल इसका महत्व केवल रसोई घर की शोभा बढाने तक ही सीमित नही है वरन् स्वास्थ्य,सौदर्य और दवाई बनाने में भी उपयोगी साबित हुआ है ।     स्वास्थ्य, की दृष्टि से हमारे ऋषि-मुनियों ने आयुर्वेद में इसके उपयोग की विस्तृत विवेचना की है। सर्दी-खॉसी हो जानें पर दादी मॉ के नुस्खे के रूप में हल्दी की फॉकी लेने की सलाह मिलती है।फोडे -फुन्सियों से छुटकारा पाने के लिये भी हल्दी का प्रयोग किया जाता है तथा पुल्टिस के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।  यही नहीं वरन् हल्दी का उपयोग शरीर के सूजन कम करने में एलोपेथि दवाओं को पीछे छोड गई है।हल्दी लीवर की बीमारियों के लिय भी उपयोगी सिद्ध हुई है यह कफ व पित से भी राहत दिलाती हैै। यही नही अपितु  हल्दी खून को  भी साफ रखती है तथा शरीर में एन्अीबायोटिक का कार्य करती है। आज कल हल्दी कई अनुसंधान हो रहे है। हल्दी में पाया जाने  वाला कुरकुमीन का उपयोग मुंख कैसर और कैसर रसौली को गलाने में किया जाता है।
आज भी ग्रामिण क्षेत्रों में पीलिया होने  जाने पर रोगी को हल्दी से बनी माला पहनाते है।




    सौंदर्य की दृष्टि से हल्दी का उबटन सर्वविदित है आजकल हल्दी से बने कई कास्मेटिक क्रीमो का प्रयोग ब्यूटी पार्लरो मे आम होगया है। आजकल हल्दी ड्ाई  ; रंजकद्ध के रूप में भी काम लायी जाती है। विशेषकर  बीज,मिठाईयो ,उनी  और रेंशमी और बोरिक एसिड की जॉच हेतु हल्दी के टरमोटिक पेपर बनाये जाते है।


 
                                            हल्दी की बडी मांग और उॅचे दामों के कारण मिलावट से बच नहीं  पायी है। पीसी हुई हल्दी में  आजकल मिलावट के रूप मे गेरू और पिली मिट्टी मिलाई जाती है। अतः स्वास्थ्य व सौदर्य की दृष्ब्टि से मिलावट की जॉच आवश्यक है। घरेलू उपाय के रूप मे पाउडर को पानी मे घोलने पर मिट्टी नीचे जमा हो जायेगी और हल्दी उपर तैरती रहेगी ।प्रयोगशाला मे शुद्ध हल्दी की जॉच करने गॅधक का तेजाब डाला जाता है,शुद्ध हल्दी का रंग  लाल होजाता हैं
                     


    हल्दी हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है अतः हल्दी का नियमित सेवन स्वास्थ्य और सौदर्य के लिए अच्छा साबित हो सकता हैं।ऐसी गुणकारी हल्दी वंदनीय व पूजनीय है।



  नोटः-यह आर्टिकल श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत द्धारा लिखित है,जो गुजराती बोल पत्रिका के दीपोत्सव अंक 2002 में छप चुका है।   


















                             

सोमवार, 8 अगस्त 2011

टॉग खिचने की प्रवृति का त्याग करे

         

              
एक बार अर्न्तराष्ट्ीय केकडा सम्मेलन  हुआ ,उसमें कई देषों के चुनिंदा केकडे सम्मिलित हुए।सभी देष अपने -अपने देषो को बास्केट में बंद करके लाये ।इस  सम्मेलन में हिन्दुस्तान भी खतरनाक केकडो के साथ  सम्मिलित हुआ,लेकिन  हिन्दुस्तानी का बास्केट खुला था, जिससे केकडे चढकर बाहर निकलने की कोषिष कर रहे थे। एक देष के प्रतिनिधि ने कहा भाई साहब आप अपनी बास्केट बंद कर दे ,कही केकडे बाहर निकलकर काट न ले
हिन्दुस्तानी  प्रतिनिधि ने कहा भाई साहब  यह हिन्दुस्तान के केकडे है,इसमें जैसे ही एक उपर चढने का प्रयास करेगा,तो दूसरा टॉग खींचकर नीचे गिरा देगा।अतः आप निष्चित रहे।इससे यही षिक्षा मिलती है अगर आपके परिवार, समाज व आपका कोई साथी  आगे बढता है,तो उसकी टॉग खींचकर गिराने का प्रयास न करे।अगर आप आगे बढने वालो को प्रोत्साहित न कर सके तो कोई बात नहीं लेकिन उसे हतोत्साहित न करे ।आज व्यक्ति किसी को आगे बढता हुआ देखता है,तो खुषी की जगह ईष्या  होती है।भाई-भाई पडौसी -पडौसी ,मित्र-मित्र को आगे बढता हुआ नही देख सकता है।इसलिए वह व्यक्ति की आलोचना करता है।उसके बारे मे अफवाह फैलाता है।इससे उसको आत्मसंतुष्टिी जरूर होती है,लेकिन इससे आगे बढने वालो को कोई  फर्क नहीं होता है।आगे बढने वाला अवष्य ही आगे बढेगा।अतः इस प्रवृति का त्याग करे।   

                                          






                                           श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
                                     

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

निस्वार्थ सेवा सच्ची सेवा है



     नेकी कर कुए में डाल




फंलेमिग नाम का एक किसान स्कांटलैड में अपने खेत में काम कर रहा था कि अचानक उसने सहायता के लिए पुकारती एक आवाज सुनी, उसने पास जाकर देखा तो एक छोटा बच्चा गहरे कीचड मे फॅसा हुआ है




 उसने बडी मेहनत करके,उसे निकाला और फिर अपने काम में जुट गया। दूसरे दिन उसने देखा एक अमीर आदमी उसकी झोंपडी में आया ओैर बोला तुमने मेरे बेटे की जान बचायी है मैं तुम्हें इनाम देना चाहता हुं । किसान ने इनाम लेने से इंनकार कर दिया और कहा यह तो मेरा कर्तव्य है। उसने किसान के पास खडे उसके फटेहाल बच्चे को देखा और कहा इसकी शिक्षा की जिम्मेदारी में उठाता हुं ,तुम उसे मुझे सौंप दो ।


कई वर्षो बाद वही बालक अलेग्जैन्डर फंलेमिंग प्रसिद्व वैज्ञानिक पैनिसिलीन का अविष्कारक बना। कुछ समय बाद उसका बेटा निमोनिया का शिकार हो गया,जिसकी जान पैनिसिलीन की  वजह से बची। उस आदमी का नाम लार्ड रैन्डोल्फ था और उसके बेटे का नाम सर विन्सटन चर्चिल।

 यह सही बात है जैसा तुम देते हो वैसा ही तुम्हें वापिस मिलता है चाहे थोडा वक्त जरूर लगता है पर प्रकति अपने पास कुछ नही रखती है व आपको खाली हाथ नही रहने देगी  आपकी अच्छाई वापिस लौटकर आपके पास जरूर आयेगी ।


 आओ दुआ करे और इसे हम जीवन का आर्दश बना ले कि नेकी किसी फल के लिए नही बल्कि आंतरिक खुशी के लिए करेगें और भूल जायेगे ।

                                 श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत

  
           मेरे द्धारा लिखित    यह आर्टिकल दैनिक भास्कर के मधुरिमा में 23 जून 2009 में एक दुआ अपने लिए     में छप चुका है।




मंगलवार, 2 अगस्त 2011

तलाक एक मानसिक रोग है


                         हिन्दुओं में विवाह को एक संस्कार माना है जो अपने में कई संस्कारों को छुपाये हुये है यह जन्मजन्मातर का बंधन है
विवाह से पहले प्यार प्रथम होता है,लेकिन विवाह के बाद प्राथमिकताए बदल जाती है पति पत्नि मन प्राण से दूध मे पानी की तरह घुल जाते है धीरे-धीरे इन संबधो में परिपक्वता आ जाती है लेकिन पति पत्नि नौकरी पैशा है, बच्चे छोटे है या अन्य कोई मानसिक या शारिरीक उलझने है  तो वह उसमे उतना व्यस्त होजाते है कि उन्हेें अपने वैवाहिक संबधोे के लिए समय ही नही मिल पाता है धीरे -धीरे इनके संबधो मेेें अल्पविराम लगने लगता है एक दिन यह अल्पविराम, विराम का अर्थात तलाक का रूप धारण कर लेता है,इसलिए  इन संबधो को संवारने के लिए निरंतर खाद पानी की जरूरत रहती है।नही तो वैवाहिक बंधन की पवित्र उॅचाई से तलाक की गहरी खाई मे गिरने में जरा भी समय नही लगेगा।


ऽ दोनो में से किसी का शक्की मिजाज दांपत्य में 
                       
 दरार पैदाकर सकता जिससे तलाक जैसी स्थिति आसकती 
है।
   ऽ पति का पत्नि के प्रति निर्मम,कठोर,हिंसापूर्ण व्यवहार व शोषण भी तलाक का कारण हो सकता हैं
    ऽ दांम्पत्य के रिश्ते मे ंप्यार सम्मान गरिमा व भरोसे की मजबूत दीवार      जब गिर जाती हैतो तलाक की नौबत आजाती है।
   ऽ संवादहीनता भी दांपत्य जीवन को ंनीरस बना कर अलगाव की स्थिति उत्पन्न कर देती है।
ऽ तृप्त यौन सुखी दांपत्य की कुंजी है, इसे नजरअंदाज करने से दांपत्य जीवन मे तलाक की स्थिति बन सकती है।
ऽ एक दूसरे के अहम आपस मे टकराते हैऔर कोई भी समझौता करने के लिए तैयार नही होता तब तलाक की स्थिति बनती है।



 

आधुनिक समाज में तलाक तेजी से बढ रहे है, बढते तलाक के लिए कई कारण जिम्मेदार हैःजिसमे बेवफाई,किसी एक का छोड कर चले जाना ,किसी एक का लाइलाज रोग से पीडित होना  पुरूषत्वहीनता ,सांस्कृतिेक जीवन शैली में मतभेद व संस्कारहीनता,आपसी समझ का अभाव,प्रतिस्पृ़द्धी प्रवृति,मानसिक अस्थिरता आदि कुछ मुख्य है

दांपत्य का रिश्ता सृष्टि का संुदरतम् रिश्ता है,छोट-मोटी  समस्या तो हर वैवाहिक जीवन में आती है इन समस्याओंसे निकलना ही जिंदगी है, हमेशा इस रिश्ते में प्यार व विश्वास की मजबूत दीवार को कायम रखे ।




श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत






 यह आर्टिकल       जगमग दीप ज्योति नामक पत्रिका की परिचर्चा    ब ढते तलाक की समस्या   में जनवरी 2011 में छप चुका है