सोमवार, 7 सितंबर 2020

पहले श्रद्धा दे ,फिर श्राद्ध करें



 हमारी संस्कृति कई रीति-रिवाजों और परंपराओं का समन्वय लिए हुए हैं| हिंदुओं में  श्राद्ध  प्रथा  प्राचीन है जो आज भी अति शुभ मानी जाती है हमारे धर्म शास्त्रों में मृत आत्माओं को उचित गति मिले इसके लिए मरणोत्तर पिंड दान और श्राद्ध तर्पण  व्यवस्था की गई है |श्राद्ध    का अर्थ है श्रद्धा पूर्ण व्यवहार तथा तर्पण का अर्थ है पितरों को तृप्त करने की प्रक्रिया है आश्विन मास में श्राद्ध   पक्ष में पितरों का तर्पण किया जाता है और पितरों की मृत्यु के नियत दिन यथाशक्ति ब्रह्म भोज और दान किया जाता है |शास्त्रों में व  गरुण पुराण में कहा गया है कि संसार में                     श्राद्ध   से बढ़कर और कल्याणप्रद  मार्ग नहीं है| बुद्धिमान मनुष्य को प्रयत्न पूर्वक श्राद्ध   करना चाहिए |पितृ पूजन से संतुष्ट होकर पितर मनुष्य के लिए आयु ,पुत्र, यश, स्वर्ग ,कीर्ति, पुष्टि बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य  देते हैं| अगर हमारे मन में जीवित माता-पिता बुजुर्गों के प्रति श्रद्धा नहीं है तो उनके मरने के बाद उनका श्राद्ध मनाने का औचित्य क्या है| हम श्राद्ध इस डर से मनाते हैं की हमारे पितरों की आत्मा कहीं भटक रही होगी तो हमें कई नुकसान नहीं पहुंचाये|उनका अंतर्मन उन्हें धिक्कार ता है कि हमने अपने मृतक को जीते जी उन्हें बहुत ही तकलीफ पहुंचाई  हैं इसीलिए हम श्राद्ध    पक्ष मना कर अपने पितरों को खुश करने का प्रयास करते हैं जिस काग की साल भर पूछ नहीं होती उन्हें श्राद्ध  पक्ष में कागो  -वा कागो -वा  करके छत की मुंडेर पर बुलाया जाता है और पितरों के नाम से पकवान खिलाया जाते हैं, पानी पिलाया जाता है और खा लेने पर यह सोच कर संतुष्ट हो जाते हैं कि हमारे पितृ हमसे प्रसन्न है |

                         

आज की युवा- पीढ़ी  श्राद्ध  मनाने के प्रति श्रद्धा भाव खत्म हो गया है| समाज की नजर में प्रशंसा पाने  और दिखावे के लिए लंबे चौड़े भोज का आयोजन करती है| हमें हमारे बुजुर्गों को जीते जी प्यार सम्मान और श्रद्धा देनी होगी मुगल बादशाह शाहजहां ने भी अपने श्राद्ध परंपरा की सराहना की है जब उनके क्रूर पुत्र सम्राट औरंगज़ेब ने उन्हें जेल में बंद कर यातना दे रहा था और पानी के लिए तरसा रहता तब आकिल खा  के ग्रंथ  ''वाकेआतआलमगीरी   में  शाहजहाने ने अपने पुत्र के नाम पत्र में मर्मान्त वाक्य  लिखे थे'' हे पुत्र तू भी विचित्र मुसलमान है जो अपने जीवित पिता को जल के लिए तरसा रहा है शत-शत  प्रशंसनीय है वह हिंदू जो अपने  मृत पिता को भी जल देते हैं |

 श्राद्ध पक्ष हमें अपने पूर्वजों के प्रति अगाध  श्रद्धा  और स्मरण भाव के लिए प्रोत्साहित करता है |हमें इसे मानकर भावी पीढ़ी को भी इससे अनुसरण करने की प्रेरणा मिलेगी|

 भुवनेश्वरी मालोत

बांसवाडा(राज)