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रविवार, 3 जुलाई 2011

चिराग जलाये, चिराग बुझाये नहीं

   मुझे एक जन्मदिन पार्टी मे जाने का अवसर मिला,देखा चारों और अच्छी खासी भीड थी। रंग-बिरंगी गुब्बारे से खुब सजावट की गयी थी,अंग्रेजी गाने चल रहे थे ,एक बडी टेबल पर ब्र्र्रडी सी केक रखी थी उस पर एक मोमबती जल रही थी जिसके पास चाकू भी रखा हुआ था,मॉ ने बच्चे को फॅुक मरवाकर मोमबतीया बुझा दी ,जोरदार तालियॉ बजी ,केक काटा ,केक बटने लगा,सभी बच्चे को उपहार व लिफाफा देकर खाने की मेज पर लपके ।

           पहले भी जन्मदिन मनाया जाता था,सूरदास कृष्ण-लीला का वर्णन करते हुये कहते हैकि यशोदा मैया कहती है‘-‘‘ आज मेरे ललन की पहली बरस गॉठ रे।’’पहले मॉ जन्मदिन पर बच्चे के सिर पर एक चम्मच दूध दही व शक्कर को मिलाकर स्नान कराती थी ।गर्म-गर्म हलवा का  भगवान को भोग लगाया जाता था यही बच्चे के लिए प्रसाद व आर्शीवाद होता था ,साथ ही भगवान के सामने  बच्चे की दीर्घायु व मंगलकामना के लिए दिया जलाया जाता था। बच्चा सभी बडो के पॉव छूकर आर्शीवार्द लेता था ।


        हमारी संस्कृति दिया जलाने की है,बुझाने की नही।घर के लडके को घर का चिराग कहा गया है, किसी के घर मे बेटा मर जाता है तो कहते है,धर का चिराग बुझ गया ,साथ ही जलता हुआ दिया बुझ जाता है तो अपशकुन माना जाता है और अग्नि को फॅूक मारकर जलाया या बुझाया नही जाता है फिर जन्मदिन पर जलती हुई रोशनी को क्यों बुझाया जाता है यह विचारणीय पहलू है।
        हमारी संस्कृति जोडने की है काटने की नही,िफर इस शुभ दिन पर केक को चाकू से काटकर लोगो का मुॅह मीठा करवाया जाता है,हॉलाकि केक अच्छा है,पर अपना हलवा क्या बुरा है।
       हमारी संस्कृति मे जीवेम शरदः शतम् का आशीवार्द देते है,जबकि आधुनिक युग में हर एक जन्मदिन पर सिर्फ एक साल के लिए दुआ मॉगते है।


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