मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

बच्चों को अच्छे संस्कारों की वसीयत दें






                 कल मै अपनी सहेली से मिलने उसके घर गई, हम लम्बे समय के बाद मिले थे, आपस में गपषप में मषगूल हो गए, पास में ही उसके बेटे के दो प्यारे-प्यारे बच्चे खेल रहे थे कि अचानक दोनों में किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया इतने में मेरी सहेली की बहू आयी और बिना कारण जाने दोनों बच्चों को एक-एक चांटा मारा और डाँटकर अपने कमरे में जाकर पढ़ने को कहा दोनों बच्चे रूआसे होकर चले गए लेकिन मेरे समक्ष एक प्रषन छोड़ गये क्या मारने-पिटने से बच्चे सुधर जायेंगे। नहीं, यह हम सभी जानते हैं कि मारने से बच्चे सुधरते नहीं और ज्यादा बिगड़ जाते हैं। बच्चा षब्द दिमाग में आते ही एक भोला भाला जिद करता हुआ मासूम-सा चेहरा आंखों के सामने घूम जाता हैं, बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, जिस संस्कार रूपी ढाँचे में डालेंगे वैसे ही बन कर निकलेंगे। बच्चों का भविष्य परिवार के वातावरण व माता-पिता के संस्कारों पर निर्भर करता हैं, वे काँच की तरह होते हैं, उन्हे तोड़ने के बाद जोड़ना बड़ा मुष्किल होता हैं। अगर माँ-बाप उनके साथ कठोर व्यवहार करते हैं तो वे भय के कारण झूठ बोलने लगेंगे। अपनी समस्या को माँ-बाप के साथ ष्षेयर नहीं कर पायेंगे जिससे वे अन्दर ही अन्दर घुटने लगेंगे। बाल्यावस्था बहुत ही नाजुक होती हैं इसमें कई ष्षारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं। ऐसे समय में बच्चों को कठोरता के साथ वात्सल्य व प्यार की भी जरूरत होती हैं। इसलिए बच्चों के साथ संतुलित व्यवहार करना जरूरी हैं।




                     आज बच्चों का बचपन तो विज्ञापनों के रंग-बिरंगे मोहजाल में जकड़ चुका हैं। वह टी.वी व पिक्चरों के पात्रों की तरह व्यवहार करते हैं जो हिंसक व अष्लील होते हैं इसका प्रभाव उनके मस्तिष्क पर उतना पड़ता हैं कि वे समय से पहले व्यस्क हो जाते हैं और सब कुछ जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। इस उम्र में बच्चे रेत की तरह होते हैं जितना कसकर पकड़ने की कोषिष करंेगे उतना हाथ से फिसल जायेंगे।


                    आज हम बच्चों केा क्या सीखा रहे हैं, आप स्वंय जानते है, बच्चों को कहते हैं बेटा मार खा कर मत आना, जो तेरे साथ जैसा व्यवहार करता हैं उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना। आज हम जब कोई घर में या स्कूल में बच्चे की भलाई के लिए डाँटते हैं या मारते हैं तो हम बच्चे का पक्ष लेते हैं और उनसे कहते हैं बच्चे को हाथ लगाने की जरूरत नहीं हैं, साथ ही आधुनिकता का सहारा लेकर माता-पिता बच्चों को आवष्यकता से अधिक लाड-प्यार दिखाकर जिद पूरी करके उनकी गलत आदतों को प्रोत्साहन देते हैं उनकी भूलों पर परदा डालने का कार्य करके उनके षुभ चितंक बनने के बजाय उनके षत्रु बन जाते हैं यहीं बच्चे जब बड़े होकर माता-पिता को पलटवार जवाब देते हैं। कहना नहीं मानते, गलत कार्य करते हैं, तब माता-पिता को होष आता हैं लेकिन अब पछताने में क्या फायदा बहुत देर हो चुकी होती हैं।

                   जैसे महावत हाथी के पैर में रस्सी ड़ालता हैं एवम् उसके छोटे बच्चे के पैर में भी जंजीर डालता हैं ताकि उसकी आदत में आ जाए। माता-पिता को भी बच्चों की वृद्धि को ध्यान रखते हुए व्यवहार करना चाहिए। बच्चों को चिंतित व व्यथित चिल्लाने वाली माँ नहीं चाहिये, उन्हे मनस्वी व प्रभावी माँ चाहिये जो उसके साथ संवाद बनाये रखे। कहा जाता है कि जो माँ दक्षता के साथ बच्चों के पेट में घुसना जानती हैं उसके बच्चे कभी गलत राह पर नहीं जा सकते हैं। माता-पिता को हमेषा अपना तीसरा नैत्र जागृत रखना चाहिए।

                        कहा गया हैं कि पूत कपूत तो क्यो धन संचय, पूत सपूत तो क्यो धन संचय। इसलिए आपका असली धन तो बच्चे हैं इसलिए बच्चों को अपने व्यस्त जीवन का कुछ समय अवष्य दे ताकि उन्हे अच्छे संस्कारों की वसीयत मिल सकें।
 


              यह सच हैं कि आज समय व परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं पाष्चात्य संस्कृति के कारण माँ-बाप की भूमिका में भी बदलाव आया हैं। आधुनिक बच्चे माँ नहीं सुपर माॅम चाहते हैं इसलिए समय के साथ आपको भी बदलना होगा, सुपर माॅम बनकर सुपर गुणों का वारिस बच्चों को बनाना होगा ताकि वह आपकी बगिया का सुन्दर फूल बन सके।
           
           प्रेषक -
          श्रीमति भुवनेष्वरी मालोत
           महादेव कालोनी
           बाँसवाड़ा (राज.)
           मो. 9414101780

सोमवार, 26 सितंबर 2011

WEERA: पहले श्रृद्धा, फिर श्राद्ध करे

WEERA: पहले श्रृद्धा, फिर श्राद्ध करे: हमारी संस्कृति कई रीति रिवाजों और परम्पराओं का समन्वय लिए हुए है। हिन्दुओं में श्राद्ध प्रथा बहुत प्राचीन है,जो आज भी अति शुभ मानी जाती है। ...

पहले श्रृद्धा, फिर श्राद्ध करे

हमारी संस्कृति कई रीति रिवाजों और परम्पराओं का समन्वय लिए हुए है। हिन्दुओं में श्राद्ध प्रथा बहुत प्राचीन है,जो आज भी अति शुभ मानी जाती है। हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार मृतात्मों को उचित गति मिले, इसके हेतु मरणोउपरांत पिडदान, श्राद्ध और तर्पण की व्यवस्था की गई है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धापूर्ण व्यवहार तथा तर्पण का अर्थ है तृप्त करना, श्राद्ध-तर्पण का अर्थ है पितरो को तृप्त करने की प्रक्रिया है। आश्विन मास में श्राद्ध पक्ष में पितरों का तर्पण किया जाता है और पितरों की मृत्यु के नियत तिथि पर यथाशक्ति बम्ह भोज और दान दिया जाता है। शास्त्रो में व गुरू पुराण में कहा गया है कि संसार में श्राद्ध से बढकर और कल्याणप्रद ओर कोई मार्ग नहीं है,अतः बुद्धिमान व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। पितृ-पूजन से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग , कीर्ति , पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते है। 

      मुगल बादशाह शाहजंहा ने भी हमारी संस्कृति  के श्राद्ध पक्ष की सराहना की है,जब उनके क्रूर्र पुत्र सम्राट  औरंगजेब ने उन्हें जेल में बंद कर यातना दे रहा था और  पानी के लिए तरसा रहा था । आकिल खाॅ के ग्रंथ वाके आत आलमगीरी के अनुसार शाहजहा ने अपने पुत्र के नाम पत्र में मंर्मात वाक्य लिखे थे ‘है पुत्र तू भी विचित्र  मुसलमान है, जो अपने जीवित पिता को जल के लिए  तरसा रहा है,शत्-शत् बार प्रशंसनीय है,वे हिन्दु जो अपने मृत पिता को भी जल देते है।’

         अगर हमारे मन में जीवित माता-पिता बुर्जगों के प्रति श्रद्धा नहीं है तो उनके मरने के बाद उनका श्राद्ध मनाने का औचित्य क्या है,हम श्राद्ध इस डर से मनाते है कि हमारे पितरों की आत्मा कही भटक रही होगी तो हमें कही नुकसान नही पहुचाए,उनका अन्र्तमन उनको धिक्कारता हैकि हमने अपने मृतक के जीते जी उन्हें बहुत तकलीफ पहुचाई है,इसलिए मरने के बाद ये  पितृ हमें भी तकलीफ पहुॅचा सकते है।इसलिए हम श्राद्ध    पक्ष मनाकर अपने पितरों को खुश करने का प्रयास करते   है। 

         जिस काग की सालभर पूछ नहीं होती है  उन्हें श्राद्ध पक्ष में कागो-वा-2 करके छत की मुडेर पर  बुलाया जाता है और पितरो के नाम से पकवान खिलाये  जाते है और पानी पिलाया जाता है,खा लेने पर यह सोचकर सन्तुष्ट हो जाते है कि हमारे पिृत हमसे प्रसन्न   है।

       आज की युवा-पीढी में श्राद्ध मनाने के प्रति श्रद्धा  भाव खत्म हो चुका है,वह समाज की नजर में प्रंशसा  पाने और दिखावे के लिए लम्बे-चैडे भोज का आयोजन  करती है।हमे हमारे बुर्जगों को जीते जी प्यार ,सम्मान व  श्रद्धा देनी होगी।      

      श्राद्ध पक्ष हमें अपने पूर्वजों के प्रति   अगाध श्रद्धा और स्मरण भाव के लिए प्रोत्साहित करता है, हमें इसे सादगीपूर्वक मनाकर भावी पीढी को भी  अनुसरण करने की प्ररेणा मिलेगी।                                                                    
                         प्रेषकः-
 श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
 अस्पताल चैराहा
  महादेव कॅालोनी
 बांसवाडा राज

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

बेटिया निराली होती है

मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में बेटी को माता.पिता की आत्मा और बेटे को हृदय की संज्ञा दी हेै। हृदय की धडकन तो कभी भी बंद हो सकती है लेकिन बेटी व आत्मा का संबध जन्मजंमातर का रहता है वह कभी अलग नहीं हो सकती है।

वाकई हमारी बेटिया निराली है उसे आप बढने मे इतनी मदद करे की वह कली से फूल बनकर फिजा मे अपनी खूशबू बिखेरा करे इन बेटियों की उपलब्धिया असीम है ।जीवन को अमृत तुल्य बनाने वाली इन बेटियो को इतना प्यार .दुलार दो कि हर लडकी की जुबान पर यही बात हो अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

कुसंस्कारो का प्रभाव



                            एक फोटोग्राफर के मन मं विचार आया कि अपने

स्टूडियो मे एक सुन्दर व सुसंस्कृत बालक का फोटो लगाये। इसके

लिए जगह-जगह घूमने के बाद उसको एक गांव में दस वर्षीय बालक

 सर्वाधिक सुन्दर लगा।उसने उसके माता -पिता की अनुमति से

उसका फाटो लिया और स्टूडियो में लगा दिया

                                        20 साल बाद उसके मन मे सबसे कुरूप

व्यक्ति का फोटो भी स्टूडियो में लगाने का विचार आया।इसके लिये

जेलों में जाकर अपराधियो से मिला जो लम्बा कारावास भुगत रहे थे

 । वहा उसे ऐसा व्यक्ति मिला जिसके चारो और मक्खिया भिनभिना

रही थी और शरीर से बदबू आ रही थी,दिखने में अत्यतं बुढा व

कुरूप लग रहा था।उसने सोचा इससे ज्यादा कुरूप व्यक्ति और कोई

नही हो सकता ।वह फोटो लेने लगा तो,वह व्यक्ति रो पडा।

                    रोने का कारण पूछा तो वह बोला जब मैं दस वर्ष का 

बालक था,तब भी एक फोटोग्राफर ने फोटो लिया था क्योंकि में उस

समय उसको सबसे सून्दर व सुसंस्कृत लगा था।किन्तु बाद में

कुसंस्कारों व कुसंगति के प्रभाव से गलत रास्ता पगड लिया और मेरे

 में कई दुर्गण आगये।जिससे झगडा,चोरी आदि करने लगा और

समाज मे भी घृणा की दृष्टि से दंेखा जाने लगा और आज में यहां

इस स्थिति मे पहुच गया।यह मेरे कुसंगति व कुसंस्कारो का ही

 परिणाम है। फोटोग्राफर बिना फोटो लिये ही वापस चला गया।

इससे पता चलता है कि वातावरण व संगति से व्यक्ति के संस्कार


प्रभावित हुए बिना नही रह सकते।संसंस्कारित बालक ही बडा होकर

 सफल होता है।पारिवारिक जीवन मे स्नेहपूर्ण वातावरण वनाता है,राष्ट्

 के विकास मे सहायक होता है अतः बच्चो को सुसंस्काति करने का

 प्रयत्न करना चाहिये ।







श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत

बुधवार, 24 अगस्त 2011

मधुमेह रोगी के लिए-अंकुरित मैथी व गेंहू के खाखरे

           
 
  

 
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   सामग्रीः-

एक कटोरी  अंकुरित गेंहू का आटा] आधी

कटोरी अंकुरित मैथी का आटा]मोयन के लिए तेल

 एकचम्मच]अजवाइन]नमक स्वादानुसार

आधचम्मच हल्दी] आधा चम्मच मिर्चं A



   विधि 

      गेंहू व मैथी को अलग अलग 7से 8 घंटे

 भिगोकर उसे कपडे में बाध कर 12से 14 घंटे के

 लिए अंकुरित होने के लिए रख दे ।अंकुरित होने


पर धूप में सूखा दे ।फिर उसका आटा तैयार

 करके दोनो आटे मिलाकर उसमें अजमाइन तेल 

]नमक हल्दी मिर्च सारी सामग्री मिलाकर।आटा

 गॅुथ ले फिर उस आटे से पतले -पतले खाखरे
बनाकर तवे पर सेक ले।


इसे एयर टाईट डिब्बे में रखे ।8से 10दिन
 तक इसको काम मे ले सकते ।

यह मधुमेह के रोगी के लिए कई

पSf"Vक तत्वो से भरपूर है।इस

मधुममेही खाखरे मे ग्लायेसेमिक

 इण्डेक्स कम है अतः 'kqगर की मात्रा बराबर बनी

 रहती है।

  श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत






रविवार, 21 अगस्त 2011

आधुनिक और पुरातन में समन्वय - नारी कैसे करे


                                                                

        
भारतीय संस्कृति की सर्वोपरि विषेषता समन्वय रखना है। भारतीय नारी संस्कृति के इसी गुण को अपना कर आधुनिक व पुरातन संस्कृति के बीच समन्वय बीठा सकती है। समन्वय आधुनिक व पुरातन संस्कृति के बीच आवश्यक है, संस्कृति चेतन है, जड़ नही। भारतीय संस्कृति में नारी को दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती के रूप में दर्शाया गया है। गणेश जी के लिए कहा जाता है कि वे सरस्वती के लिपिक रहे है। इसी से यह प्रदशित होता है कि नारी का प्रभाव किसी भी प्रकार से पुरूष से कम नहीं है।



                    सदियों से नारी के कार्य क्षेत्र को परिवार तक सीमित रखकर उसे परिवार की इच्छाओं व आंकाक्षाओं के लिए हर पल त्याग की उम्मीद की जाती है। घर की धूरी मानी जाने वाली नारी को हर क्षेत्र में अपने आप को आधुनिक कहलाने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।  आधुनिक शिक्षा ने नारी को महत्वकांक्षी बना दिया है। प्रतिर्स्पद्वा की दौड़ में वह अपने परिवार व बच्चों को भूल कर पुरूषों से आगे निकल जाना चाहती है, लेकिन अपनी संस्कृति को कायम रखने की उम्मीद नारी से ही की जाती है। आज की नारी कुछ बातों को ध्यान में रखकर दोनों में सांमजस्य स्थापित कर सकती है।



 सर्वप्रथम नारी को शिक्षित हो कर आत्म निर्भर होना होगा। महात्मा गांधी का कथन है कि ‘‘एक शिक्षित नारी सारे परिवार को षिक्षित कर सकती है’’। इसी लिए षिक्षित नारी ही आधुनिकता व अपनी संस्कृति में सांमजस्य अच्छी तरह बनाए रख सकती है।



 नारी का सर्वश्रेष्ठ रूप माता का है। वह बालक की गुरू, मित्र, सहयोगी बन कर उसमें अच्छे संस्कारों को पल्लवित कर सकती है। आधुनिकता की अन्धी दौड हमे किस ओर ले जायेगी, किस सीमा तक इसकी अच्छाइयों को अपनाना है, यह माता ही बता सकती है। हमारी संस्कृति के आर्दषों को बालक के अधखिले मन पर अंकुरित कर सकती है। अधिकांष महापुरूष अपनी माता द्वारा षिक्षित और प्रेरित हो कर ही महापुरूष बने है।


ऽ आधुनिक नारी को आज हर क्षेत्र में पुरूष के साथ कदम से कदम मिला कर चलने को  तैयार रहना है। ऐसी स्थिति में अन्धप्रतिर्स्पद्वा का त्याग कर के परिवार के प्रति अपने  कर्तव्य को प्राथमिकता दें।


ऽ अतिव्यस्त जीवन व टी वी संस्कृति से आपसी रिष्तों में दूरिया पैदा कर दी है। नारी अपने  विवेक से कई रीति-रिवाजों को अपना कर विभिन्न रिष्तों में सांमजस्य पैदा कर सकती है।

ऽ आज की नारी को कुरीतियों और अन्धविष्वासों को त्यागकर के व अपने आप को समाज के खौखले आर्दषों से मुक्त कर के समाज में अपना स्थान बनाना होगा ताकि उस पर आधुनिक सुसंस्कृत नारी का लेबल लग सकें।




ऽ आधुनिक नारी मिनी-स्कर्ट व जीन्स पहन कर क्लब, किटी पार्टीयों में जाकर अपने आपको आधुनिकता के भ्रम जाल में फंसा रही है। वह यह भुल रही है कि यह उसे अपनी संस्कृति से  दूर कर पतन की ओर ले जा रहा है। भड़कीली वेषभूषा पर व्यय करना उचित नहीं है। नारी हमारी संस्कृति के अनुरूप पोषाक पहनकर व मर्यादा में रह कर समन्वय रख सकती  है।


ऽ मिथ्या प्रदर्षन की भावना, फैषन की सनक, झूठी षान व अनावष्यक तृष्णा में नारी उलझी हुई है। नारी को आध्ुानिकता की इस मृग तष्णा के जाल से बाहर निकलकर हमारी संस्कृति के आर्दषों को अपनाना होगा।

ऽ टेलीविजन संस्कृति जो परिवार में आवष्यकता से अधिक पनप रही है, इसका प्रयोग सीमित करना होगा।





ऽ  आज की नारी को परिवार में आधुनिकता के साथ आध्यात्मिक व नैतिकता का वातावरण पैदा करना होगा क्योंकि आध्यात्मिक, नैतिक षिक्षा व संस्कार की जननी नारी है।

ऽ आज के युग में नारी को जो समानता का अधिकार दिया है उसको कायम रखना है। संयुक्त परिवार की रक्षा नारी कर सकती है। नारी को अपनी षक्ति को प्रयोग कर पुरू ष को व्यसनों से दूर रखना होगा। उदाहरण के तोर पर दक्षिण में महिलाओं ने षराब बन्दी आंदोलन अपने हाथो में लिया जिसका असर वहा दिखने लगा है।

ऽ नारी को वर्तमान आय के साधनों को बढ़ाने में पति का साथ देने के साथ गृहस्थ जीवन को समुचित ढ़ंग से चलाना होता है। गृहस्थ जीवन तभी सुखी रह सकता है जब परिवार के प्रति नारी अपना दायित्व समझे। हमारी संस्कृति में पत्नी व्रत व पति व्रत ग्रहस्थ जीवन के मुख्य अंग है उनका पालन करना आवष्यक है। नारी को घर चलाना होेता है इसके लिए घर का बजट आय के स्त्रोतों को देखकर बनाना चाहिए।





 इन बातों को अपने जीवन में अपना कर आधुनिक सुसंस्कारित आर्दश समाज की स्थापना में नारी अपना अमुल्य योगदान दे सकती है।  










 
  लेखिकाः-

श्रीमति भुवनेष्वरी मालोत



नोटः- यह आर्टिकल जगमग दीप ज्योति पत्रिका के बाल विषेंषाक फरवरी 2010 में छप चुका है।